बल्लारी जिले में उत्खनन के दौरान प्रागैतिहासिक औजार, मिट्टी के बर्तन और शिलायुगीन अवशेष भी मिले
सिरुगुप्पा (बल्लारी). बल्लारी जिले के सिरुगुप्पा तालुक अंतर्गत तेक्कलकोटे क्षेत्र में चल रहे उत्खनन कार्य के दौरान लगभग पांच हजार वर्ष पुराने आदिम मानव कंकाल की खोज से इतिहासकारों और पुरातत्वविदों में उत्साह है। यह खोज दक्षिण भारत की प्रागैतिहासिक सभ्यता के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
तेक्कलकोटे के गौड्र मूले पहाड़ी क्षेत्र में लगभग साढ़े पांच फुट लंबा मानव कंकाल मिला है, जिसे प्रारंभिक आकलन में नवपाषाण काल का बताया जा रहा है। उत्खनन दल की सह-निदेशक और अमरीका के हार्टविक विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. नमिता एस. सुगंधि ने कहा कि यह अवशेष नवपाषाण काल का हो सकता है।
पिछले एक माह से तीन विशेषज्ञ दलों द्वारा हिरे अर्ल, बूदी दिब्बा, बाले तोटा, जक्केरु गुड्डा और हुडेदगुड्डा सहित आसपास के कई क्षेत्रों में उत्खनन एवं शोध कार्य किया जा रहा है। उत्खनन के दौरान बड़े घड़ों में अस्थियां मिलीं, जिससे संकेत मिलता है कि उस काल में विशेष प्रकार की शव-संस्कार पद्धति प्रचलित थी।
नवपाषाण युग के प्रमाण
उत्खनन में नुकीले पत्थर के औजार, हाथ-कुल्हाड़ी, पशुओं के दांत, ओखली, गोल पत्थर और विभिन्न आकार के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह क्षेत्र शिलायुगीन औजार निर्माण का प्रमुख केंद्र रहा होगा। एक ही स्थान पर शिलायुग, नवशिलायुग और धातु युग के प्रमाण मिलना इसे और भी विशिष्ट बनाता है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग
ग्रीस विश्वविद्यालय की जैव-प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ सुजैन क्रिक पैट्रिक स्मिथ अवशेषों के संरक्षण, काल निर्धारण और पुनर्संरचना के कार्य में मार्गदर्शन दे रही हैं। इस शोध दल में आईआईटी कानपुर, कलबुर्गी केंद्रीय विश्वविद्यालय तथा अन्य संस्थानों के शोधार्थी भी शामिल हैं।
संरक्षण की मांग
स्थानीय शिक्षाविद मनोहर ने सरकार और पुरातत्व विभाग से इस ऐतिहासिक क्षेत्र के संरक्षण की मांग की है। उन्होंने कहा कि स्थल की महत्ता दर्शाने वाले सूचना-पट्टों, समुचित मार्ग और बुनियादी सुविधाओं का अभाव शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए बाधा बन रहा है।
विशेषज्ञों की राय
यहां मिले औजार सूक्ष्म शिलायुग के हैं और मानव जीवन के प्रारंभिक चरणों को समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे।
–आर. शेजेश्वर, उपनिदेशक, हंपी-कमलापुर पुरातत्व संग्रहालय
तेक्कलकोटे कर्नाटक के सबसे महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक स्थलों में से एक है।
– प्रो. सोमशेखर, प्राध्यापक, पुरातत्व अध्ययन विभाग, हंपी कन्नड़ विश्वविद्यालय
यह इतिहास के विद्यार्थियों के लिए एक खजाना है। मानव कंकाल को कार्बन डेटिंग के लिए भेजा जाएगा और इसके संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
–डॉ. नमिता सुगंधी, प्राध्यापिका, हार्टविक यूनिवर्सिटी, अमरीका

