विलुप्तप्राय ‘लेसर फ्लोरिकन’ का प्रजनन स्थल
घासभूमि बढ़ाने की पहल
बीदर. झरनों की धरती के रूप में प्रसिद्ध बीदर जिला अब दुर्लभ वन्यजीवों के महत्वपूर्ण आवास के रूप में भी पहचान बना रहा है। समुद्र तल से ऊंचाई पर स्थित यह क्षेत्र कई संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान कर रहा है।
हाल ही में भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के अध्ययन में पुष्टि हुई है कि विश्व में मात्र 150 से 200 की अनुमानित संख्या वाली विलुप्तप्राय प्रजाति लेसर फ्लोरिकन (काला मोर) बीदर में पाई जाती है। इतना ही नहीं, यह क्षेत्र इनके प्रजनन का भी प्रमुख केंद्र है। यह पक्षी राजस्थान, आंध्र प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक के बीदर जिले में ही देखा जाता है। पर्यावरणविदों का कहना है कि राज्य सरकार ने पूर्व में संरक्षण के लिए अनुदान स्वीकृत किया था, लेकिन अब इस दिशा में ठोस प्रयासों की आवश्यकता है।
बीदर में चिंकारा (इंडियन गजेल) भी पाए जाते हैं, जो राज्य में केवल कुछ ही जिलों में दिखाई देते हैं। इसके अलावा भारतीय भेडिय़ा, नीलगाय, चार सींग वाला मृग (चौसिंगा), सिवेट कैट, जंगली सूअर और लोमड़ी जैसे वन्यजीव यहां विचरण करते हैं। खुले मैदानों में सैकड़ों की संख्या में कृष्णमृग (काला हिरण) और हिरण देखे जा सकते हैं, जिससे यह क्षेत्र वन्यजीव प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।
पक्षी प्रजातियों में डेमोइसेल क्रेन सहित अनेक प्रवासी और स्थानीय पक्षियों का यहां बसेरा है। हाल के वर्षों में तेंदुओं की गतिविधियां भी दर्ज की गई हैं। दो वर्ष पूर्व करंजा जलाशय क्षेत्र में एक तेंदुआ मृत अवस्था में मिला था। वहीं मांजरा नदी के किनारे कभी-कभार मगरमच्छ भी दिखाई देते हैं।
हालांकि मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन हिरण और कृष्णमृगों द्वारा खेतों में घुसकर फसल नुकसान की घटनाएं सामने आती रहती हैं।
वन विभाग के अनुसार, जिले के कोनमेलकुंदा, चटनाल, शमशेरनगर, आलूर और गडिकुशनूर क्षेत्रों में घासभूमि बढ़ाने के प्रयास जारी हैं। 1970 के दशक से पहले यहां व्यापक घासभूमि थी, परंतु बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के कारण इसका दायरा घट गया। अब पुन: प्राकृतिक आवास बहाली की दिशा में काम किया जा रहा है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अवैध खनन, निर्माण कार्यों और भारी वाहनों की आवाजाही से वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्ग प्रभावित होने पर चिंता जताई है और सख्त नियंत्रण की मांग की है।
प्रकृति प्रेमी एवं नैचुरलिस्ट विवेकानंद बी. ने कहा कि जिले में मौजूद वन्यजीवों की सुरक्षा केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है। वन विभाग द्वारा नियमित निगरानी, जागरूकता अभियान और प्राकृतिक आवासों की रक्षा जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। बावजूद इसके, यदि लोग असावधानी बरतें या वन्यजीवों के प्राकृतिक वातावरण में हस्तक्षेप करें, तो संरक्षण के प्रयास प्रभावित हो सकते हैं।

