हिन्दी शिक्षकों ने सभापति होरट्टी और केंद्रीय मंत्री जोशी को सौंपा ज्ञापन
हुब्बल्ली. कर्नाटक राज्य प्रौढ़शाला हिन्दी शिक्षक संघ के बैनर तले राज्य के हिन्दी शिक्षकों ने रविवार को विधान परिषद के सभापति बसवराज होरट्टी और केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी ने मुलाकात कर स्कूली शिक्षा में त्रिभाषा सूत्र को जारी रखने की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा।
शिक्षकों ने सभापति और केंद्रीय मंत्री जोशी से राज्य सरकार पर दबाव बनाने का आग्रह किया।
ज्ञापन स्वीकार कर सभापति बसवराज होरट्टी ने तुरन्त मुख्यमंत्री सिध्दरामय्या, शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा, शिक्षा विभाग के मुख्य सचिव आदि संबंधितों को फोन कर इस मुद्दे पर बात की और सरकार को अपना निर्णय वापस लेने की मांग की।
इसके बाद होरट्टी ने शिक्षकों से कहा कि वे शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबध्द हैं। त्रिभाषा नीति को जारी रखने को लेकर वे मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर दबाव बनाएंगे।
शिक्षकों से ज्ञापन स्वीकार कर केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी ने कहा कि केंद्र सरकार राजभाषा हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए कई कार्यक्रम आयोजित करती रही है। वे राज्य में त्रिभाषा नीति जारी रखने को लेकर राज्य सरकार पर दबाव बनाएंगे। प्रांतीय भाषा को प्रथमिकता देनी चाहिए साथ ही अन्य भाषाओं को भी सम्मान देना चाहिए।
ज्ञापन में कहा कि मनोविज्ञान का दावा है कि भाषाई भावनाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में अधिक भाषाएं सीखने से मानव मस्तिष्क का विकास बढ़ता है। राष्ट्रीय एकता के हित में और बहुभाषा सीखने को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, देश में 1961 से त्रिभाषी सूत्र लागू किया गया है। भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि भाषा सीखने से छात्रों के लिए फायदेमंद है, नुकसानदेह नहीं है। त्रिभाषी सूत्र छात्रों को विभिन्न भाषाओं में प्रभावी ढंग से संवाद करने में सक्षम बनाता है।
यह छात्रों को अपने बाद के जीवन में अन्य राज्यों में करियर बनाने और अध्ययन करने में सुविधा प्रदान करता है। जैसा कि संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है, त्रिभाषी सूत्र भाईचारे और भाषाई विविधता का सम्मान और संरक्षण करता है। कर्नाटक सरकार की ओर से हाईस्कूलों में द्विभाषी नीति अपनाने के संबंध में हाल ही में जारी प्रेस वक्तव्य उपरोक्त सभी पहलुओं को उलट-पुलट कर सकते हैं।
यदि द्विभाषी नीति लागू की गई, तो राज्य भर के सरकारी और अनुदानित हाईस्कूलों में वर्तमान में कार्यरत 15,000 शिक्षकों का भविष्य चिंताजनक होगा। अनुदान रहित हाईस्कूलों में हिंदी शिक्षक के तौर पर कार्यरत और अल्प वेतन पर जीवनयापन करने वाले शिक्षकों का जीवन सडक़ों पर आ जाएगा।
इसके अलावा, भाषा विषय पढ़ाने वाले शिक्षक और उन पर भरोसा करने वाले परिवार भी प्रभावित होंगे, कई भावी शिक्षक जिन्होंने बी.एड. की डिग्री प्राप्त की है और हिंदी भाषा के शिक्षक बनने का सपना देख रहे हैं, वे बेरोजगार हो जाएंगे।
दक्षिण भारत में हिंदी के इस विरोध के कारण, दक्षिण भारत से प्रधानमंत्री नहीं बन पा रहे हैं। अगर बन भी जाए, तो हिन्दी भाषा नहीं आने के कारण वे लंबे समय तक उस पद पर नहीं रह पाएंगे। कभी-कभी हमने ऐसी स्थिति भी देखी है जहां केंद्रीय मंत्री भी हिंदी सीखने के लिए शिक्षकों की नियुक्ति करते हैं।
इसके चलते हमारी आने वाली पीढ़ी के साथ ऐसा न हो, ताकि वे आने वाले अवसरों से वंचित न रहें, और स्कूलों में त्रि-भाषा सूत्र को वर्तमान की तरह ही जारी रखाना चाहिए। राज्य में हिन्दी भाषा में 17909 से ज्यादा छात्रों ने 100 अंकों के साथ एसएसएलसी परीक्षा उत्तीर्ण हुए हैं।
किसी अन्य विषय में इतने छात्रों ने 100 अंक नहीं प्राप्त किए हैं परन्तु कुछ लोग कहते हैं कि हिंदी में फेल होने वाले छात्र ज्यादा हैं। हिंदी में पास होने वाले छात्र अन्य सभी विषयों से ज्यादा हैं। और हिंदी में प्राप्त अंक ही उनके समग्र परिणाम में वृद्धि का कारण हैं। इसलिए राज्य में श्रीभाषा फॉर्मूला जारी रखना चाहिए।
इस अवसर पर हिंदी शिक्षक संघ के प्रदेशाध्यक्ष डी मंजुनाथ, उपाध्यक्ष ममता डीके., महासचिव मालतेश चलवादी, कोषाध्यक्ष अविनाश हिरेमठ, शिक्षक केशव कोंगी, किरण सिंह फुलानेकर, स्वरूप कदम, रमेश तलवार, रमेश पुजार, सुनंदा समेत सैकड़ों शिक्षक उपस्थित थे।

