कलबुर्गी में कृषि संगोष्ठी
कलबुर्गी. शहर में आयोजित गन्ना उत्पादक किसानों की संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक खेती अपनाने पर बल देते हुए कहा कि सौर ऊर्जा, जलशक्ति और मिट्टी की जैविक शक्ति का समुचित प्रबंधन किया जाए तो गन्ने की पैदावार 100 टन प्रति एकड़ तक पहुंचाई जा सकती है।
धारवाड़ कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति विठ्ठल आई. बेणगी ने कहा कि गन्ने की समृद्ध वृद्धि के लिए पर्याप्त धूप, संतुलित सिंचाई और उर्वर मिट्टी अनिवार्य है। खेत में आवश्यकता के अनुसार ही पानी देना चाहिए, अधिक सिंचाई नुकसानदेह है।
उन्होंने कहा कि सामान्यत: एक एकड़ में तीन टन गन्ने का बीज लगाया जाता है, जिससे लगभग दो लाख पौधे निकलते हैं, लेकिन इनमें से केवल 50 हजार ही परिपक्व होकर मिल तक पहुंचते हैं। यदि प्रत्येक गन्ने का वजन एक किलोग्राम माना जाए तो कुल 50 टन उपज मिलती है, जबकि शेष पौधे पानी और खाद की अनावश्यक खपत करते हैं।
डॉ. बेणगी ने पंक्ति से पंक्ति की दूरी 5-6 फीट और पौधे से पौधे की दूरी 2 फीट रखने की सलाह दी। उनके अनुसार एक स्वस्थ पौधे को लगभग एक वर्ग फुट स्थान चाहिए। इस पद्धति से प्रति पौधा 7-8 कल्ले निकल सकते हैं और प्रत्येक का वजन लगभग डेढ़ किलोग्राम होने पर 80 टन प्रति एकड़ तक उत्पादन संभव है।
मिट्टी की गिरती उर्वरता पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि 1980 में एक किलोग्राम रासायनिक पोषक तत्व डालने पर 14 किलोग्राम खाद्यान्न उत्पादन होता था, जबकि अब यह घटकर मात्र 4 किलोग्राम रह गया है। गन्ने की बेहतर पैदावार के लिए मिट्टी में कम से कम 0.75 प्रतिशत जैविक कार्बन होना चाहिए, जबकि वर्तमान में यह 0.25 से 0.30 प्रतिशत के बीच है।
डॉ. बेणगी ने हरी खाद के उपयोग पर जोर देते हुए प्रति एकड़ 25 किलोग्राम सन, ढैंचा या अन्य दलहनी फसल बोकर डेढ़ माह बाद उसे मिट्टी में मिलाने की सलाह दी। इससे लगभग 6 टन गोबर खाद के बराबर लाभ मिलता है।
संगोष्ठी में अन्य कृषि वैज्ञानिकों ने भी उन्नत किस्मों, रोपण तकनीक और देखभाल के वैज्ञानिक तरीकों पर प्रकाश डाला। विशेषज्ञों ने कहा कि यदि समय रहते मिट्टी की जैविक शक्ति बढ़ाने के उपाय नहीं किए गए तो भविष्य में उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है।

