होलिका उत्सव में फाइबर के ‘चंग’ की धूमहुब्बल्ली के पुराने कोर्ट सर्कल में बिक्री के लिए रखे गए फाइबर के चंग।

परंपरागत चमड़ा वाद्यकारों की रोजी पर संकट

कारखानों में बने सस्ते वाद्यों ने छीना कारीगरों का काम

शिग्गावी, मुंडरगी, नरगुंद और मिरज से व्यापारी हुब्बल्ली पहुंचे
हुब्बल्ली. होली पर्व में रंगों की जितनी अहमियत है, उतनी ही ‘चंग’, ‘जग्गलगी’ और ‘कणी’ जैसे पारंपरिक वाद्यों की भी रही है। कभी ये वाद्य चमड़े से तैयार होते थे, लेकिन बदलते समय के साथ अब फाइबर के चंग बाजार पर छा गए हैं। पिछले कुछ वर्षों से होली के दिन शहर में फाइबर चंगों की गूंज आम हो गई है और उत्सव का हिस्सा बन चुकी है।

शहर के पुराने कोर्ट सर्किल में बड़ी मात्रा में फाइबर चंग बिक्री के लिए सजाए गए हैं। हावेरी जिले के शिग्गावी, गदग जिले के मुंडरगी और नरगुंद तथा महाराष्ट्र के मिरज से व्यापारी यहां आकर कारोबार कर रहे हैं। मूलत: ये परिवार पारंपरिक चमड़ा वाद्य निर्माता रहे हैं। हारमोनियम, तबला समेत अन्य वाद्य बनाना और उनकी मरम्मत करना उनका पैतृक पेशा रहा है। हालांकि, बाजार की मांग को देखते हुए अब वे मजबूरी में फाइबर वाद्य बेच रहे हैं। गांव लौटने पर वे फिर अपने परंपरागत काम में जुट जाते हैं।

चमड़े के वाद्य तैयार करने में अधिक श्रम, समय और कौशल की आवश्यकता होती है। साथ ही, उच्च गुणवत्ता का चमड़ा मिलना भी कठिन हो गया है। इसके विपरीत, फाइबर चंग कारखानों में बड़े पैमाने पर तैयार होते हैं, जिससे उनकी उत्पादन लागत कम होती है। यही कारण है कि चमड़े के वाद्य फाइबर की तुलना में महंगे पड़ते हैं।

शिग्गांव से आए व्यापारी मंजुनाथ हनुमंतप्पा बगरिकार ने कहा कि फाइबर चंग कारखानों में बनते हैं। हम केवल उन्हें बेचकर गुजारा करते हैं, असली लाभ कारखाना मालिकों को होता है। यदि लोग चमड़े के वाद्य खरीदें तो कारीगरों को काम और आय मिल सकती है, लेकिन समय बदल गया है और कलाकारों की जिंदगी कठिन हो गई है। कुछ वर्ष पहले वे बड़ी संख्या में चमड़े के वाद्य लाए थे, लेकिन बिक्री न होने से नुकसान उठाकर उन्हें वापस ले जाना पड़ा।

दलित श्रमिकों के असंगठित संघ के अध्यक्ष विजय कर्रा ने आरोप लगाया कि चमड़ा उद्योग, जो पहले दलित समुदाय से जुड़ा माना जाता था, अब उच्च वर्गों के हाथों में चला गया है। सरकार ने कारखानों को लाइसेंस देकर हमारे पारंपरिक पेशे को हमसे छीन लिया। पहले हम मृत पशुओं की खाल से काम करते थे, अब पशु बूढ़े होने पर सीधे बूचडख़ानों में भेजे जाते हैं, जहां से संसाधित चमड़ा बड़े कारखानों और विदेशों को निर्यात हो जाता है। हमें पहले की तरह कच्चा माल भी नहीं मिल पा रहा है।

बाजार में ग्राहकों की पसंद के अनुसार विभिन्न आकार, रंग और डिजाइनों में फाइबर चंग उपलब्ध हैं। 80 से 1200 रुपए तक की कीमत वाले इन वाद्यों पर क्रिकेटर विराट कोहली और रोहित शर्मा, शिवाजी महाराज, शेर-चीता, तबला, सैक्सोफोन, वीणा और बच्चों के पसंदीदा कार्टून पात्रों की आकर्षक तस्वीरें बनी हैं, जो खरीदारों को लुभा रही हैं।

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By Bharat Ki Awaz

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