मानव लापरवाही से बढ़े खतरे
सैकड़ों एकड़ वन क्षेत्र को नुकसान
यादगीर. पहाडिय़ों और झाडिय़ों से घिरे यादगीर जिले में गर्मी शुरू होते ही जंगलों में आग लगने की घटनाएं आम होती जा रही हैं। जिले के विभिन्न हिस्सों में सूखी घास, झाडिय़ां, खेतों के किनारे और सडक़ किनारे पड़े कचरे में आग लगने से वन क्षेत्र को लगातार नुकसान हो रहा है। चिंताजनक बात यह है कि अधिकांश आगजनी की घटनाएं मानव गतिविधियों के कारण ही हो रही हैं।
सैकड़ों एकड़ वन क्षेत्र प्रभावित
जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्र में लगभग 6.54 प्रतिशत यानी 33,773 हेक्टेयर क्षेत्र में वन फैला हुआ है। इसके अलावा 11,755 हेक्टेयर स्थायी गोमाल और 772 हेक्टेयर में वृक्ष व बागान हैं। पिछले पांच वर्षों में करीब 301 एकड़ वन क्षेत्र आग की चपेट में आ चुका है, जबकि इस वर्ष के शुरुआती दो महीनों में ही 10 एकड़ क्षेत्र प्रभावित हुआ है।
मानव लापरवाही बनी बड़ी वजह
खेती खत्म होने के बाद खेतों में बची सूखी घास और कांटेदार झाडिय़ों को जलाने की प्रवृत्ति आम है। कई बार सडक़ किनारे भी आग लगा दी जाती है, जो धीरे-धीरे जंगलों तक फैल जाती है। इसके अलावा जलती सिगरेट फेंकना और शरारती तत्वों द्वारा जानबूझकर आग लगाना भी बड़ी वजह बन रहा है।
वन विभाग के अनुसार, आग से न केवल पेड़-पौधे नष्ट होते हैं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी खत्म हो जाती है। छोटी वनस्पतियां जड़ सहित जलकर राख हो जाती हैं, जिससे पर्यावरण संतुलन पर गंभीर असर पड़ता है।
अवैध लकड़ी कटाई से जुड़ा मामला
स्थानीय लोगों के अनुसार, कुछ लोग रात के समय जंगल के पास झाडिय़ों में आग लगाकर पेड़ों को सुखा देते हैं और बाद में उन्हें काटकर घरेलू उपयोग में लाते हैं। यह प्रवृत्ति भी जंगलों के नुकसान का एक बड़ा कारण बन रही है।
कर्मचारियों की कमी से बढ़ी चुनौती
जिले में वन विभाग के करीब 40 प्रतिशत पद खाली हैं, जिससे करीब 40 हजार हेक्टेयर क्षेत्र की निगरानी में कठिनाई हो रही है। विभाग ने अधिक फॉरेस्टर, गार्ड और वॉचर्स की आवश्यकता जताई है।
तालुकों में वन क्षेत्र का वितरण
यादगीर तालुक में सबसे अधिक 12,058 हेक्टेयर वन क्षेत्र है। इसके अलावा गुरमठकल में 11,823 हेक्टेयर, शहापुर में 2,673 हेक्टेयर, सुरपुर में 2,575 हेक्टेयर, हुणसगी और वडगेरा में भी उल्लेखनीय वन क्षेत्र मौजूद है।
ऐतिहासिक किले तक पहुंचा खतरा
हजारों वर्ष पुराने यादगीर किले के आसपास भी आग का असर देखा जा रहा है। किले के चारों ओर उगी झाडिय़ां जलकर नष्ट हो रही हैं, जिससे इसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। स्थानीय लोगों ने किले के संरक्षण के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो हर साल बढ़ती यह आग न केवल वन संपदा, बल्कि पर्यावरण और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए भी गंभीर खतरा बन सकती है।
फायर लाइन और अलर्ट सिस्टम सक्रिय
संवेदनशील क्षेत्रों में ‘फायर लाइन’ बनाई गई हैं। आग लगते ही अलर्ट संदेश मिलता है, जिसके बाद वनकर्मी और फायर वॉचर्स तुरंत मौके पर पहुंचकर आग बुझाने का प्रयास करते हैं। जरूरत पडऩे पर अग्निशमन दल की मदद भी ली जाती है।
–ए.बी. पाटील, उप वन संरक्षण अधिकारी
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