मोरेर जनजाति द्वारा उपयोग किए गए लोहे के अयस्क की खोज
2000–3000 वर्ष पुरानी तकनीक के प्रमाण
कोप्पल। जिले के गंगावती तालुक स्थित प्रागैतिहासिक स्थल हिरेबेनकल में मोरेर जनजाति से जुड़े लौह अयस्क (आयरन ओर) के महत्वपूर्ण अवशेषों की खोज की गई है। हिरेबेनकल अन्वेषण दल ने इस ऐतिहासिक खोज को अंजाम दिया, जिसकी जानकारी शोधकर्ता डॉ. शरणबसप्पा कोलकर ने दी।
प्राचीन तकनीक का प्रमाण
शोध के अनुसार, 2000 से 3000 वर्ष पूर्व दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक क्षेत्र में निवास करने वाली मोरेर जनजाति ने सबसे पहले लोहे को परिष्कृत कर उपयोग में लाने की तकनीक विकसित की थी।
यह जनजाति अपने पूर्वजों की समाधियों के निर्माण के लिए पत्थरों को काटने के लिए लोहे के औजारों का उपयोग करती थी। इसके अलावा दैनिक जीवन में भी कुल्हाड़ी, चाकू, भाले की नोक, तलवार, हल के उपकरण जैसे कई औजार तैयार किए जाते थे।
लौह युग और मेगालिथिक संस्कृति
लोहे के व्यापक उपयोग के कारण इस कालखंड को ‘लौह युग’ कहा जाता है। साथ ही, बड़े-बड़े पत्थरों से बने समाधि स्थलों के कारण इसे ‘मेगालिथिक (बृहद शिलायुग)’ संस्कृति के रूप में भी जाना जाता है।
विशेष बात यह है कि उस समय एक किलोग्राम अयस्क से लगभग 350 ग्राम शुद्ध लोहा निकालने की उन्नत तकनीक विकसित हो चुकी थी, जो उस युग की वैज्ञानिक समझ को दर्शाती है।
200 मीटर क्षेत्र में मिले अवशेष
अब तक हिरेबेनकल में मोरेर जनजाति द्वारा लोहे के उपयोग के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले थे। लेकिन हालिया खोज में ‘दुर्गदड़ी’ क्षेत्र के लगभग 200 मीटर विस्तार में परिष्कृत लोहे के अवशेष बिखरे हुए पाए गए हैं।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह अयस्क पास के संडूर क्षेत्र से लाकर यहां संसाधित किया गया होगा। यहां ठोस रूप में जमे हुए पिघले लोहे के टुकड़े भी बड़ी संख्या में मिले हैं।
आगे होगा विस्तृत अध्ययन
शोधकर्ताओं के अनुसार, इन अवशेषों का विस्तृत अध्ययन आगे किया जाएगा, जिससे प्राचीन धातु विज्ञान और जनजातीय तकनीक के बारे में और महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आ सकती हैं।
इस अन्वेषण में चंद्रशेखर कुंबार, मंजुनाथ दोडमनी, हरनायक और हुसैन बाशा सहित अन्य सदस्य भी शामिल थे।
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