महंगा हुआ केरोसिन तेलकारवार के अलीगद्दा में समुद्र तट पर खड़ी देशी नावें।

पारंपरिक मछुआरों को हो रही चिंता

कारवार. पारंपरिक मछुआरे जो पहले से ही रोशनी में मछली पकडऩे की गतिविधियों और बुल ट्रॉलिंग के कारण मछली की कमी से परेशान हैं, अब उन्हें महंगे केरोसिन तेल ने और अधिक संकट में डाल दिया है।

जब यांत्रिक मछली पकडऩे का सीजन शुरू होता है, तब समुद्र में उतरने को तैयार मोटरबोट से मछली पकडऩे वाले मछुआरों को केरोसिन की ऊंची कीमतें आर्थिक बोझ का कारण बन सकती हैं।

एक साल पहले 35 रुपए प्रति लीटर मिलने वाला केरोसिन अब 62 रुपए प्रति लीटर हो गया है, जिससे मछुआरों की चिंता बढ़ गई है।
पारंपरिक मछुआरों का कहना है कि जिले में पर्सीन और ट्रॉलर नौकाओं की तुलना में पारंपरिक नौकाओं की संख्या अधिक है। 8,000 पारंपरिक नौकाओं में से लगभग 4,000 नौकाएं मोटराइज्ड हैं और इन्हें केरोसिन की आवश्यकता होती है। यांत्रिक नौकाओं से जहां टन भर मछलियां पकड़ी जा सकती हैं, वहीं पारंपरिक नौकाओं में कुछ किलो मछली पकडऩे के लिए हजारों रुपए खर्च करने पड़ते हैं।

मछुआरों पर बना भारी आर्थिक बोझ

एक मोटराइज्ड पारंपरिक नौका को हर महीने 200 लीटर केरोसिन दिया जाता है। यह सुविधा साल में सिर्फ 9 महीनों तक उपलब्ध होती है। दो साल पहले इसकी कीमत 35 रुपए प्रति लीटर थी, जो अब दोगुनी हो गई है। समुद्र में एक नौका चलाने के लिए प्रति घंटे कम से कम 8 लीटर केरोसिन लगता है। इसके साथ 2टी इंजन ऑयल और पेट्रोल जोडऩे पर प्रति घंटे का खर्च 850 से 900 रुपए तक पहुंचता है। प्रति दिन 6,000 से 8,000 रुपए तक केवल ईंधन पर खर्च होता है, परन्तु मौजूदा हालात में इतनी मछली मिलना भी संभव नहीं है। यह मछुआरों पर भारी आर्थिक बोझ बन गया है।

बैठक में लिया निर्णय

मोटराइज्ड पारंपरिक नौकाएं अगस्त के पहले सप्ताह से ही मछली पकडऩे का कार्य शुरू करती हैं, परन्तु केरोसिन का वितरण सितंबर से होता है। अगर इससे पहले ही कीमतें घटा दी जाएं, तो यह बहुत लाभकारी होगा। केरोसिन की कीमत कम करने के लिए सरकार पर दबाव बनाने के लिए पारंपरिक मछुआरा संघ की बैठक में निर्णय लिया गया है।
सोमनाथ मोगेर, राज्य उप महासचिव, पारंपरिक मछुआरा संघ

केंद्र सरकार ने रोकी केरोसिन की आपूर्ति

केंद्र सरकार की ओर से केरोसिन की आपूर्ति रोक दी गई है। अब इसे कर्नाटक फिशरीज डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन (केएफडीसी) के माध्यम से खरीदा जा रहा है और मछुआरा सहकारी समितियों के माध्यम से वितरित किया जा रहा है।
रवींद्र तळेकर, संयुक्त निदेशक, मत्स्य विभाग

दर बढऩे का कारण

पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण की दृष्टि से केंद्र सरकार ने केरोसिन के उपयोग पर रोक लगाई है, जिससे इसकी आपूर्ति बंद हो गई। पहले जो केरोसिन 35 रुपए प्रति लीटर मिलता था, अब उसकी जगह केएफडीसी के जरिए सफेद केरोसिन खरीदकर दिया जा रहा है जो प्रदूषण कम करता है, लेकिन उसकी कीमत ज्यादा है। विभाग अब मछुआरों को पेट्रोल इंजन लगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। प्रत्येक इंजन पर 50,000 रुपए की सब्सिडी दी जा रही है। जिले में अब तक लगभग 2,000 पारंपरिक नौकाओं में पेट्रोल इंजन लगाए जा चुके हैं।
प्रतीक शेट्टी, उपनिदेशक, मत्स्य विभाग

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By Bharat Ki Awaz

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