आदिनाथ भगवान के जन्म कल्याणक के साथ चैत्र वद अष्टमी से वर्षीतप का होगा प्रारंभ
दावणगेरे. श्रीशंखेश्वर पाश्र्व राजेन्द्र गुरुमंदिर संघ काईपेट में विराजित साध्वी भव्यगुणा ने कहा कि जैन धर्म की मूल आधारशिला ‘तप’ है। आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से लेकर अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी तक का इतिहास यह स्पष्ट करता है कि आत्मा को कैवल्य ज्ञान प्राप्त करने और संचित कर्मों का क्षय करने के लिए तप की अग्नि में स्वयं को तपाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भगवान आदिनाथ का जन्म कल्याणक और वर्षीतप का प्रारंभ चैत्र वद अष्टमी से होता है। जैन आगम और कथा साहित्य में कठिन साधना और सिद्धि के लिए ‘तेला तप’ जैसे उपवासों का उल्लेख मिलता है। तप से न केवल आत्मिक शुद्धि होती है, बल्कि शरीर और मन को भी शांति तथा शक्ति प्राप्त होती है।
साध्वी भव्यगुणा ने वर्षीतप के ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि अवसर्पिणी काल के तीसरे आरे में जन्मे भगवान ऋषभदेव ने समाज को ‘असि, मसि और कृषि’ का ज्ञान देकर व्यवस्था स्थापित की थी। एक प्रसंग में किसानों को कृषि सिखाते समय बैलों को अनाज खाने से रोकने के लिए उनके मुख पर जाली बांधने की सलाह दी गई। इससे उन मूक प्राणियों को आहार में जो अंतराय हुआ, उसके परिणामस्वरूप प्रभु को भी अंतराय कर्म का बंध हुआ।
उन्होंने कहा कि दीक्षा के बाद लोगों को मुनियों की आहार विधि का ज्ञान नहीं था, इसलिए वे आहार के स्थान पर रत्न या आभूषण भेंट करते थे। अंतत: हस्तिनापुर में राजकुमार श्रेयांस ने अक्षय तृतीया के दिन भगवान को गन्ने के रस से पारणा कराया और यहीं से आहारदान की परंपरा प्रारंभ हुई।
साध्वी भव्यगुणा ने कहा कि भगवान आदिनाथ के 400 दिनों के तप की स्मृति में वर्षीतप की परंपरा शुरू हुई, जो चैत्र कृष्ण अष्टमी से अगले वर्ष अक्षय तृतीया तक चलता है। इसमें एक दिन उपवास और दूसरे दिन बियासना का क्रम चलता है। तप से तन, मन और आत्मा की शुद्धि होती है और आज का विज्ञान भी ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग’ के माध्यम से इसकी महत्ता को स्वीकार कर रहा है।

