धूल, धुआं और रासायनिक जल से बिगड़ रहा जनस्वास्थ्य
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी
दांडेेली (उत्तर कन्नड़). शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते प्रदूषण ने जनस्वास्थ्य पर गंभीर असर डाला है। पिछले दो-तीन वर्षों से यहां धूल का स्तर लगातार बढ़ रहा है। उद्योगों से निकलने वाला धुआं, हवा में उड़ती राख और काली नदी में मिलने वाला रासायनिक मिश्रित जल स्थानीय लोगों के लिए बड़ी समस्या बन गया है।
इसके चलते एलर्जी, त्वचा रोग, अस्थमा, ब्रॉन्काइटिस, श्वसन संक्रमण और सांस लेने में कठिनाई जैसी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। अस्पतालों में इन रोगों से पीडि़त मरीजों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं।
स्थानीय संगठनों और नागरिकों ने बार-बार पर्यावरण अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया, लेकिन आरोप है कि अधिकारी केवल औपचारिकता निभाकर उद्योगों के पक्ष में अनुकूल रिपोर्ट सरकार को भेज रहे हैं। जनहित की निगरानी समिति बनाने की मांग भी अनसुनी कर दी गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग से अपेक्षा है कि वह इस स्थिति को गंभीरता से लेकर जिला प्रशासन और पर्यावरण विभाग के साथ मिलकर ठोस कदम उठाए। यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो ये रोग गंभीर रूप ले सकते हैं।
चिकित्सकों की कमी भी बड़ी चुनौती है। एलर्जी और श्वसन रोगों के लिए स्थानीय सरकारी अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। निजी अस्पतालों में भी धारवाड़ और हुब्बल्ली से आने वाले परामर्शदाता चिकित्सक केवल सप्ताह में एक बार या पंद्रह दिन में आते हैं। मरीजों को उनके आने का इंतजार करना पड़ता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि सरकार सरकारी अस्पताल में स्थायी विशेषज्ञ डॉक्टर नियुक्त करे तो रोगियों को बड़ी राहत मिलेगी। यह समस्या अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि गंभीर जनस्वास्थ्य संकट बन चुकी है।

