श्रीशैलम यात्रा की स्मृतियों से जन्मी आरती
पांच दिन तक गूंजते भक्ति गीत
सभी धर्म-समुदाय की भागीदारी
रबकवी-बनहट्टी (बागलकोट). रबकवी-बनहट्टी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में श्रीशैलम स्थित भगवान मल्लिकार्जुन की जत्रा के बाद आयोजित होने वाली ‘मंगल आरती’ आज भी अपनी सदियों पुरानी परंपरा के साथ जीवंत है। यह आरती न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि पौराणिक यात्रा अनुभवों की जीवंत अभिव्यक्ति भी मानी जाती है।
पदयात्रा की स्मृतियों से जन्मी परंपरा
पुराने समय में जब श्रीशैलम जाने के लिए परिवहन की सुविधा नहीं थी, तब श्रद्धालु सैकड़ों किलोमीटर की कठिन पदयात्रा या बैलगाडिय़ों से यात्रा करते थे। इस दौरान वे अपने अनुभवों—कठिनाइयों, आस्था और उत्साह को गीतों के माध्यम से व्यक्त करते थे। यही गीत समय के साथ ‘मल्लिकार्जुन मंगल आरती’ के रूप में विकसित हुए।
गीतों में झलकती यात्रा की पीड़ा और आस्था
मंगल आरती के गीतों में यात्रा के दौरान आने वाली चुनौतियां, पहाड़ों की चढ़ाई, विश्राम के पल और दुर्घटनाओं का भय भी झलकता है। इन भजनों में भक्ति के साथ-साथ लोकजीवन का गहरा चित्रण मिलता है, जो इस परंपरा को और भी विशिष्ट बनाता है।
पांच दिन तक चलता है भक्ति उत्सव
यह विशेष मंगल आरती लगातार पांच दिनों तक मंदिर में गाई जाती है। इसमें महिलाएं आरती करती हैं, जबकि पुरुष हाथों में दीप लेकर भक्ति में लीन होते हैं। संबल और ताल की धुन पर सामूहिक रूप से गाए जाने वाले ये भजन एक घंटे से अधिक समय तक वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।
सामाजिक समरसता का प्रतीक
इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि इसमें सभी जाति, धर्म, उम्र और वर्ग के लोग बिना किसी भेदभाव के शामिल होते हैं। यह आयोजन सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है।
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