गैस संकट से बदला रसोई का तरीकासांदर्भिक एआई फोटो।

उडुपी में होटल लकड़ी और टर्बोवुड चूल्हों की ओर

घरों में इंडक्शन स्टोव की मांग बढ़ी

मछुआरे फिर केरोसिन स्टोव पर लौटे

उडुपी. एलपीजी सिलेंडर की कमी के चलते उडुपी जिले में रसोई के तरीके तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। होटल संचालक पारंपरिक लकड़ी के चूल्हों के साथ संशोधित तकनीक वाले टर्बोवुड स्टोव और इंडक्शन कुकवेयर का उपयोग शुरू कर रहे हैं, जबकि घरों में भी इंडक्शन चूल्हों की मांग अचानक बढ़ गई है।

होटलों में जगह की उपलब्धता के अनुसार लकड़ी के चूल्हों पर खाना पकाया जा रहा है। हालांकि शहर के सभी होटलों के लिए यह संभव नहीं है। इसलिए कई होटल संचालक टर्बोवुड स्टोव का उपयोग कर रहे हैं। इसमें लकड़ी के चूल्हे के साथ एक इलेक्ट्रिक पंखा लगाया जाता है, जिससे आग की तीव्रता नियंत्रित रहती है और धुआं भी कम निकलता है। पिछले चार-पांच दिनों में ऐसे स्टोव की मांग काफी बढ़ गई है। कई छोटे होटल और कैंटीन संचालक एक-दो स्टोव के सहारे काम चला रहे हैं।

घर-घर में इंडक्शन कुकटॉप

गैस की कीमतों में बढ़ोतरी और सिलेंडर की कमी के कारण लोग घरों के लिए इंडक्शन कुकटॉप खरीदने लगे हैं। हालांकि इसमें हर प्रकार के बर्तनों का उपयोग संभव नहीं होता, इसलिए उपभोक्ता इंडक्शन के अनुकूल बर्तन भी साथ में खरीद रहे हैं। बाजार में इंडक्शन स्टोव की मांग सामान्य से कई गुना बढ़ गई है।

व्यापारियों के अनुसार घरों में इसका उपयोग आसान है, लेकिन बड़े होटलों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए बिजली कनेक्शन में बदलाव और निरंतर बिजली आपूर्ति जरूरी होती है। बिजली कटौती होने पर खाना बनाना मुश्किल हो सकता है।

मेंगलूरु में भी बढ़ी मांग

मेंगलूरु में भी अचानक इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री बढ़ गई है। अगरी एंटरप्राइजेज के मालिक राघवेंद्र राव अगरी के अनुसार पहले जहां कभी-कभार एक-दो यूनिट बिकती थीं, वहीं अब सैकड़ों कुकटॉप बिक रहे हैं।

शहर की प्रमुख किचनवेयर दुकान के मालिक रामकृष्ण कामत ने बताया कि स्टॉक लगभग खत्म हो चुका है और नए स्टॉक का ऑर्डर दिया गया है।

मछुआरे फिर केरोसिन स्टोव पर

गैस संकट का असर मछली उद्योग पर भी पड़ा है। पहले गहरे समुद्र में जाने वाली नावों पर एलपीजी सिलेंडर से भोजन पकाया जाता था, लेकिन अब सिलेंडर नहीं मिलने के कारण मछुआरे फिर से केरोसिन और डीजल से चलने वाले स्टोव खरीद रहे हैं।

उडुपी जिले में करीब 1700 गहरे समुद्र की मछली पकडऩे वाली नावें और 200-300 गिलनेट नावें हैं। उत्तर कन्नड़ और दक्षिण कन्नड़ जिलों में भी बड़ी संख्या में ऐसी नौकाएं हैं, जिन पर लंबी समुद्री यात्राओं के दौरान भोजन नाव पर ही पकाना पड़ता है।

मलपे ट्रॉलर बोट एसोसिएशन के अध्यक्ष करुणाकर एस. साल्यान ने कहा कि यदि मछुआरों को समय पर गैस या अन्य ईंधन उपलब्ध नहीं हुआ तो इसका असर न केवल उनकी आजीविका पर बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। उन्होंने सरकार से मछुआरों के लिए आवश्यक ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित करने की मांग की है।

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By Bharat Ki Awaz

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