उत्सवों के मूल उद्देश्य को समझें, आडंबर से बचेंनवपद आयंबिल साधना के आठवें दिन जैन मरुधर संघ में आयोजित धर्मसभा में भाग लेते श्रावक-श्राविकाएं।

विमलसागर सूरीश्वर का आह्वान

उत्सव आत्मचिंतन के लिए, दिखावे के लिए नहीं

हुब्बल्ली. शहर में नवपद आयंबिल साधना के आठवें दिन जैन मरुधर संघ में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैनाचार्य विमलसागर सूरीश्वर ने कहा कि उत्सव दुनिया को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को देखने और सुधारने के लिए होते हैं। आज समाज में उत्सवों का स्वरूप बदलता जा रहा है और उनका मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूटता जा रहा है।

आचार्य ने स्पष्ट किया कि महापुरुषों के जीवन और उनके आदर्शों को जीवंत बनाए रखने के लिए ही विभिन्न उत्सव मनाए जाते हैं, न कि केवल दिखावा या मनोरंजन के लिए।

महापुरुषों के पदचिन्हों पर चलना ही सच्ची श्रद्धांजलि

उन्होंने कहा कि समय-समय पर महान संत और महापुरुष इस धरती पर जन्म लेते हैं और धर्म, समाज तथा मानवता के उत्थान के लिए कार्य करते हैं। उनके जाने के बाद उन्हें जीवित रखने का एकमात्र तरीका है-उनके बताए मार्ग पर चलना। तीर्थंकरों, आचार्यों और संतों के उत्सव इसी भावना को आगे बढ़ाने के लिए मनाए जाते हैं। आज समाज उत्सवप्रियता में इतना डूब गया है कि मूल भावनाएं ही भूलता जा रहा है।

आचार्य ने स्वतंत्रता दिवस, दीपावली, रामनवमी, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, पर्युषण, महावीर जन्म कल्याणक, रक्षाबंधन, पोंगल, उगादी जैसे कई त्योहारों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन सभी के पीछे गहरे आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश हैं, जो अब धीरे-धीरे ओझल होते जा रहे हैं।

आडंबर से नुकसान, प्रेरणा नहीं

आचार्य ने चेतावनी देते हुए कहा कि जब उत्सव केवल दिखावे और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बन जाते हैं, तब वे समाज को कोई प्रेरणा नहीं देते। इसके विपरीत, ऐसे आयोजनों में धन, समय और ऊर्जा का अनावश्यक व्यय होता है।

उन्होंने लोगों से अपील की कि वे उत्सवों को सादगी, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति के माध्यम के रूप में मनाएं।

 

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By Bharat Ki Awaz

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