महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल
कड़े कानूनों के बावजूद घटनाएं जारी
कई मामले अब भी रिपोर्ट नहीं हो रहे
हुब्बल्ली. राज्य में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कानून मौजूद होने के बावजूद यौन उत्पीडऩ और अत्याचार के मामलों में कमी नहीं आई है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य महिला आयोग में पिछले तीन वर्षों के दौरान कुल 349 शिकायतें दर्ज की गई हैं।
कार्यस्थल पर बढ़ते उत्पीडऩ के मामले
अप्रेल 2025 से जनवरी 2026 के बीच कार्यस्थलों पर यौन उत्पीडऩ और अत्याचार से जुड़े 123 मामले सामने आए। इनमें से 51 मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जबकि 72 मामले अभी भी जांच के विभिन्न चरणों में लंबित हैं।
कई मामले दर्ज ही नहीं होते
विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ मामले ही कानूनी प्रक्रिया तक पहुंच पाते हैं, जबकि बड़ी संख्या में घटनाएं रिपोर्ट ही नहीं हो पातीं। यह स्थिति और भी चिंताजनक मानी जा रही है।
घरेलू हिंसा के मामलों में भी वृद्धि
महिलाओं के खिलाफ अत्याचार केवल कार्यस्थल तक सीमित नहीं हैं। पारिवारिक स्तर पर भी हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं। वर्ष 2026 में राज्य महिला आयोग को इस संबंध में 668 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 472 मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जबकि 196 मामले अभी भी लंबित हैं।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश भी बेअसर
1997 में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीडऩ को रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे। इनमें यौन उत्पीडऩ की परिभाषा, रोकथाम के उपाय, शिकायत समिति का गठन और पीडि़तों की सुरक्षा के प्रावधान शामिल हैं।
इन दिशा-निर्देशों के अनुसार, शारीरिक संपर्क, अनुचित यौन मांग, अश्लील सामग्री दिखाना जैसे कृत्य अपराध की श्रेणी में आते हैं। साथ ही, कार्यस्थल पर सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना संस्थान के प्रबंधन की जिम्मेदारी तय की गई है।
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