जंगल की गोद में धनगर गवली समाज का अनूठा दशहरामुंडगोड़ कस्बे की साप्ताहिक मंडी में दशहरा की खरीदारी करते हुए गवली समाज के लोग।

पान-सुपारी से न्योता, रातभर जागरण और गज नृत्य की धूम

पीढिय़ों से सहेजी जा रही लोक परंपरा

मुंडगोड (उत्तर कन्नड़)। जंगलों के बीच बसे धनगर गवली समाज के लिए दशहरा केवल त्योहार नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता और सदियों पुरानी लोक संस्कृति को जीवित रखने का अवसर है। पान-सुपारी देकर उत्सव का न्योता देने से लेकर रातभर जागरण, गज नृत्य और सामूहिक भोज तक, यहां दशहरे की परंपराएं आज भी पूरे उत्साह से निभाई जाती हैं। मुंडगोड तालुक के 20 से अधिक गांवों और गवली वाड़ों में यह अनूठा उत्सव पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रहा है।

बड्डिगेरी, कलकिकारे, गोदनाल, उग्गिनकेरी, मैनल्ली, ब्यानल्ली, सिरीगेरी, जेनमुरी और न्यासर्गी सहित कई गांवों में दशहरे की तैयारियां विशेष अंदाज में होती हैं। यहां उत्सव का न्योता देने का तरीका भी अनोखा है। साप्ताहिक बाजार में समाज के बुजुर्ग एक-दूसरे को पान का पत्ता देकर अपने गांव या गवली वाड़े में दशहरा मनाने के लिए आमंत्रित करते हैं। न्योता पाने वाले लोग अपने परिचितों को भी इसकी जानकारी देते हैं और समूह में उत्सव में शामिल होने पहुंचते हैं। इस तरह एक परंपरा लोगों को आपस में जोडऩे का माध्यम बनती है।

घटस्थापना के दूसरे दिन से जागरण और उत्सव का सिलसिला तेज हो जाता है। समाज के युवा और बुजुर्ग घर-घर जाकर गज नृत्य प्रस्तुत करते हैं। घंटों चलने वाले इस पारंपरिक नृत्य में लोक जीवन की झलक दिखाई देती है। घरों में चावल, दूध, घी और गुड़ से विभिन्न पकवान तैयार किए जाते हैं। इन्हें मिल-बांटकर खाने की परंपरा को ‘घरातला दशहरा’ कहा जाता है।

उत्सव में महिलाओं की भागीदारी भी खास होती है। वे अपने-अपने घरों से छाछ से भरे बर्तन लाकर निर्धारित स्थान पर एकत्र करती हैं। विशेष पूजा के बाद ‘बेसबेडग़ु’ समूह के सदस्य प्रतीकात्मक रूप से अपने शरीर पर छाछ लगाकर उत्सव मनाते हैं। यह अनुष्ठान सामुदायिक परंपरा का विशिष्ट हिस्सा है।

आधुनिकता के दौर में भी धनगर गवली समाज का दशहरा अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। जागरण, गज नृत्य, सामूहिक भोज और पारंपरिक अनुष्ठान इस उत्सव को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक विरासत और आपसी भाईचारे का जीवंत प्रतीक बनाते हैं।

समाज के वरिष्ठ नेता भागु कोकरे के अनुसार, पान देकर निमंत्रण देने की परंपरा लोगों को एकजुट करती है और उत्सव में सामूहिक भागीदारी सुनिश्चित करती है।

युवा नेता सिद्धू तोरवत बताते हैं कि छाछ से जुड़ी रस्में और पारंपरिक नृत्य दशहरे को विशिष्ट पहचान देते हैं।

 

Breaking News सबसे पहले पाना चाहते हैं?

अभी हमारे WhatsApp Channel को join करें

हर खबर सबसे पहले

Join करें : https://whatsapp.com/channel/0029Vb7S2RA65yD9fZX4Og1Z

Spread the love

By Bharat Ki Awaz

मैं भारत की आवाज़ हिंदी न्यूज़ पोर्टल से जुड़ा हुआ हूँ, जहाँ मेरा उद्देश्य पाठकों तक सटीक, निष्पक्ष और ताज़ा ख़बरें पहुँचाना है। राजनीति, समाज, संस्कृति और स्थानीय मुद्दों पर गहरी रुचि रखते हुए मैं हमेशा कोशिश करता हूँ कि समाचार केवल सूचना न हों, बल्कि पाठकों को सोचने और समझने का अवसर भी दें। मेरी लेखनी का मक़सद है—जनता की आवाज़ को मंच देना और देश-समाज से जुड़े हर पहलू को ईमानदारी से प्रस्तुत करना। भारत की आवाज़ के माध्यम से मैं चाहता हूँ कि पाठक न केवल ख़बरें पढ़ें, बल्कि उनसे जुड़ाव महसूस करें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *