भीषण गर्मी में भी नहीं सूखा मंजनकजे तालाब
पारंपरिक जल प्रबंधन बना मिसाल
सुल्या (दक्षिण कन्नड़). जहां एक ओर गर्मी के बढ़ते प्रकोप के साथ तटीय क्षेत्रों के कई गांवों में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है, वहीं सुल्या तालुक के पेरुवाजे गांव के कणावा क्षेत्र में एक तालाब ने जीवन को हरा-भरा बनाए रखा है। मंजनकजे तालाब न केवल 35 एकड़ के बगीचे की 80 प्रतिशत जल आवश्यकता पूरी करता है, बल्कि आसपास के क्षेत्रों को भी हरियाली से भर देता है।
गर्मी में भी कायम हरियाली
अन्य क्षेत्रों में जहां दिसंबर के बाद ही पानी की कमी शुरू हो जाती है, वहीं कणावा में व्यवस्थित जल प्रबंधन के कारण अप्रेल माह में भी तालाब में पर्याप्त पानी बना रहता है। यहां चरणबद्ध सिंचाई प्रणाली अपनाई गई है, जिसमें छोटे-छोटे जलाशयों (ऊजुकेरे) से लेकर मुख्य तालाब तक पानी का संतुलित उपयोग होता है।
पारंपरिक तकनीक से बना ‘जलचक्र’
बगीचे में बनाए गए एडकट्ट (छोटे बांध), नालियां और जलाशय मिलकर एक जीवंत जलचक्र तैयार करते हैं। ऊपरी हिस्से से बहने वाला पानी नीचे जमा होकर पुन: उपयोग में लाया जाता है, जिससे कम पानी में भी अधिक हरियाली संभव हो पाती है।
संघर्ष से बनी स्थायी व्यवस्था
सन् 1972 में तालाब का बांध टूट गया था, लेकिन किसान नरसिंह भट्ट ने हार नहीं मानी। इंजीनियरों की मदद से उन्होंने 150 फीट लंबा और 140 फीट चौड़ा मजबूत बांध पुन: निर्मित कराया, जो आज भी जल संरक्षण का आधार बना हुआ है।
पीढिय़ों की सोच का परिणाम
1950 के दशक में शुरू हुई इस जल संरचना को अब तीसरी पीढ़ी आगे बढ़ा रही है। आधुनिक स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली के साथ तालाब का पानी पूरे बगीचे को जीवन देता है। हर पांच दिन में सिंचाई पर्याप्त होती है, जिससे पानी की बचत भी होती है।
प्राकृतिक संसाधनों का सहयोग
तालाब के आसपास का हरा-भरा वन क्षेत्र और ऊपर स्थित कल्पडमले संरक्षित जंगल से आने वाली जलधाराएं मिट्टी में नमी बनाए रखती हैं। इसका लाभ आसपास के करीब 200 एकड़ क्षेत्र को भी मिलता है।
यह मॉडल पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक सोच का बेहतरीन उदाहरण है, जो जल संकट से जूझ रहे अन्य क्षेत्रों के लिए प्रेरणादायक साबित हो सकता है।
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