"पुस्तकें सत्ता के लिए सबसे बड़ा भय" - मावल्ली शंकरविजयपुर में ‘बुद्ध-बसव-आंबेडकर पुस्तक मेला’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डीएसएस के राज्य संचालक मावल्ली शंकर।

‘बुद्ध-बसव-आंबेडकर पुस्तक मेला’ का शुभारंभ

विचारधारा और साहित्य की शक्ति पर जोर

विजयपुर. दक्षिण भारत दलित संगठन (डीएसएस) के राज्य संचालक मावल्ली शंकर ने कहा कि सत्ता को सबसे अधिक डर पुस्तकों से होता है, क्योंकि विचार और ज्ञान ही परिवर्तन की असली ताकत हैं।
वे शहर के दरबार मैदान में आयोजित ‘बुद्ध, बसव और आंबेडकर पुस्तक मेला’ के उद्घाटन अवसर पर संबोधित कर रहे थे।

वैचारिक साहित्य से सत्ता को चुनौती

मावल्ली शंकर ने कहा कि बसव काल से ही वैचारिक और प्रगतिशील साहित्य को दबाने की कोशिशें होती रही हैं। सत्ता किसी और चीज से नहीं, बल्कि विचारों से डरती है, और ये विचार पुस्तकों के माध्यम से ही फैलते हैं।

दलित साहित्य ने दिखाई वास्तविकता

उन्होंने प्रख्यात साहित्यकार सिद्धलिंगय्या का उदाहरण देते हुए कहा कि शोषित और पीडि़त वर्ग की पीड़ा को विद्रोही साहित्य ने सामने लाया। भूख और अपमान झेलने वाला व्यक्ति दरबारी भाषा में नहीं लिख सकता, उसकी अभिव्यक्ति संघर्ष से ही निकलती है।

इतिहास को तोडऩे-मरोडऩे पर चिंता

शंकर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज पुस्तकों के माध्यम से ही इतिहास और परंपरा को तोडऩे-मरोडऩे की कोशिश हो रही है। उन्होंने लेखकों से अपील की कि वे अपनी लेखनी को समाज के कमजोर वर्गों के पक्ष में समर्पित करें।

आंबेडकर के जीवन से प्रेरणा

उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर एक महान पाठक थे और उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि कठिन समय में वे पुस्तकों से ही प्रेरणा लेते थे। पुस्तकें ही उनके विचार और संघर्ष की शक्ति बनीं।

इस अवसर पर बेलगावी की क्षेत्रीय आयुक्त केएम. जानकी, दलित पैंथर्स के संस्थापक जेवी. पवार, मेला आयोजक बसवराज सूलीबावी, कन्नड़ साहित्य परिषद जिला अध्यक्ष हासिमपीर वालिकार सहित कई गणमान्य उपस्थित थे।

कार्यक्रम के तहत साहित्यकारों की शोभायात्रा निकाली गई, जिसे बागलकोट विश्वविद्यालय के कुलसचिव सोमलिंग गेन्नूर ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

 

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By Bharat Ki Awaz

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