दावणगेरे दक्षिण और बागलकोट में मुकाबला हुआ रोचक
बगावत और अंदरूनी कलह से बदला समीकरण
हुब्बल्ली. कर्नाटक की राजनीति में दावणगेरे दक्षिण और बागलकोट विधानसभा उपचुनाव अब पूरी तरह गरमा चुके हैं। दोनों सीटों पर मुकाबला केवल सहानुभूति लहर तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह चुनाव अब वंशवाद बनाम विकास और बगावत बनाम संगठन की सीधी टक्कर में बदलता नजर आ रहा है।
सहानुभूति लहर पड़ रही कमजोर
आम तौर पर उपचुनावों में दिवंगत नेताओं के परिजनों को सहानुभूति का लाभ मिलता है, लेकिन इस बार दोनों क्षेत्रों में यह लहर कमजोर पड़ती दिख रही है।
कांग्रेस ने दावणगेरे दक्षिण में दिवंगत शामनूर शिवशंकरप्पा और बागलकोट में एचवाई. मेटी के परिवारजनों को टिकट देकर सहानुभूति भुनाने की रणनीति बनाई थी, लेकिन जमीनी हकीकत अलग नजर आ रही है।
दावणगेरे में बगावत, वोट बैंक पर खतरा
दावणगेरे दक्षिण में टिकट वितरण से नाराज मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने पार्टी के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया है। इससे मुस्लिम वोटों के बंटवारे की आशंका बढ़ गई है।
एसडीपीआई सहित कई निर्दलीय उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से कांग्रेस का समीकरण बिगड़ता दिख रहा है।
बागलकोट में परिवारिक कलह बना मुद्दा
बागलकोट में मेटी परिवार के भीतर टिकट को लेकर हुए विवाद ने कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। परिवार के सदस्यों के बीच खुला विवाद सहानुभूति लहर को कमजोर कर रहा है।
पिछले दो वर्षों में विकास कार्यों की कमी और बढ़ती नाराजगी ने भी सत्ता विरोधी माहौल को मजबूत किया है।
भाजपा का ‘वंशवाद’ पर हमला
दोनों सीटों पर भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ वंशवाद को बड़ा मुद्दा बनाया है। दावणगेरे में एक ही परिवार के लंबे समय से सत्ता में बने रहने को प्रचार का मुख्य हथियार बनाया जा रहा है।
वहीं बागलकोट में भाजपा उम्मीदवार वीरन्ना चरंतिमठ अपने अनुभव और विकास के एजेंडे के दम पर कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।
विकास बनाम सहानुभूति की लड़ाई
बागलकोट में अब मुकाबला सहानुभूति से ज्यादा विकास और स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित हो गया है। मतदाता रोजगार, बुनियादी ढांचे और विकास कार्यों को प्राथमिकता देते नजर आ रहे हैं।
कांग्रेस उम्मीदवार उमेश मेटी जहां अनुभवहीन माने जा रहे हैं, वहीं भाजपा उम्मीदवार का अनुभव उनके पक्ष में जाता दिख रहा है।
सीएम के लिए प्रतिष्ठा का सवाल
बागलकोट उपचुनाव मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। वे स्वयं प्रचार में सक्रिय हैं और ‘अहिंद’ (अल्पसंख्यक, पिछड़े, दलित) समीकरण के सहारे जीत सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने सरकारी गारंटी योजनाओं और कृष्णा परियोजना को प्रमुख मुद्दा बनाकर मतदाताओं को साधने का प्रयास तेज कर दिया है।
कड़ी टक्कर तय
कुल मिलाकर, दोनों ही क्षेत्रों में सहानुभूति लहर, बगावत, वंशवाद और विकास जैसे मुद्दों के बीच चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प और कांटे का बन गया है। परिणाम किसके पक्ष में जाएगा, यह मतदाताओं की अंतिम पसंद पर निर्भर करेगा।
Breaking News सबसे पहले पाना चाहते हैं?
अभी हमारे WhatsApp Channel को join करें
हर खबर सबसे पहले
Join करें : https://whatsapp.com/channel/0029Vb7S2RA65yD9fZX4Og1Z

