पार्टी और समुदाय दोनों में बढ़ी पकड़
टिकट विवाद के बीच रणनीतिक संतुलन साधकर जमीर अहमद खान ने मजबूत की सियासी स्थिति
हुब्बल्ली. दावणगेरे दक्षिण उपचुनाव केवल जीत-हार का मुकाबला नहीं रहा, बल्कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और रणनीति की नई परतें भी सामने आ रही हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा राजनीतिक लाभ अगर किसी नेता को मिला है, तो वह हैं मंत्री जमीर अहमद खान।
मुस्लिम नेतृत्व के केंद्र में जमीर
मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या के करीबी माने जाने वाले जमीर अहमद खान लंबे समय से राज्य स्तर पर मुस्लिम समुदाय के प्रमुख चेहरे के रूप में खुद को स्थापित करने की कोशिश में हैं।
बेंगलूरु, ओल्ड मैसूर और उत्तर कर्नाटक में उनकी पकड़ पहले से ही मजबूत मानी जाती है। दावणगेरे दक्षिण के टिकट विवाद ने इस नेतृत्व को और उभारने का मौका दिया।
टिकट विवाद में रणनीतिक भूमिका
दावणगेरे दक्षिण में मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देने की मांग उठते ही जमीर ने खुलकर समर्थन दिया। इससे यह मुद्दा जिला स्तर से निकलकर राज्य स्तर तक चर्चा में आ गया।
हालांकि, बगावत और अंदरूनी खींचतान के दौरान जमीर सीधे तौर पर सामने नहीं आए, जिससे उन्होंने दोनों पक्षों के बीच अपनी स्थिति संतुलित बनाए रखी।
सही समय पर एंट्री, शक्ति प्रदर्शन
जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होने लगी, तब मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या के कहने पर जमीर कर्नाटक लौटे और सीधे दावणगेरे पहुंचे।
उनका भव्य स्वागत हुआ और रोड शो के जरिए उन्होंने अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया। इससे न केवल पार्टी नेतृत्व, बल्कि स्थानीय नेताओं को भी स्पष्ट संदेश गया कि उनकी अनदेखी आसान नहीं है।
एक तीर से दो निशाने
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जमीर ने इस पूरे घटनाक्रम में “एक तीर से दो निशाने” साधे हैं। पार्टी के भीतर अपनी अहमियत साबित की और मुस्लिम समुदाय में अपनी पकड़ और मजबूत की।
जीत-हार दोनों में फायदा
दावणगेरे दक्षिण में कांग्रेस की जीत होती है, तो जमीर इसे अपनी रणनीति और अंतिम समय में किए गए प्रचार का परिणाम बता सकते हैं। वहीं, अगर हार होती है तो वे यह संदेश दे सकते हैं कि उनकी अनदेखी पार्टी को भारी पड़ी।
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