सरकारी योजना से मंजूर मकान अधूरा
मजदूरी से गुजर-बसर कर रही महिला की पीड़ा
चित्रदुर्ग. हिरियूर तालुक के मस्कल गांव में एक महिला अपनी दो बेटियों के साथ झोपड़ी में जीवन बिताने को मजबूर है। पति की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही मारक्का के पास पंचायत से मंजूर मकान को पूरा करने के लिए 60 हजार रुपए तक जुटाने की भी क्षमता नहीं है।
15 साल से अधूरी है घर की आस
मारक्का का परिवार गांव के श्मशान के सामने स्थित कब्जे की जमीन पर रह रहा है। करीब 15 वर्ष पहले ग्राम पंचायत ने दो मकान मंजूर किए थे। इनमें से एक मकान उनकी एक बेटी ने किसी तरह पूरा कर लिया, लेकिन मारक्का और दूसरी बेटी अब भी झोपड़ी में रह रही हैं।
कुछ साल पहले पंचायत ने एक और मकान मंजूर किया। मारक्का ने किसी तरह मजदूरी कर मकान को लिंटल स्तर तक तैयार किया, जिसके बाद पंचायत से 60 हजार रुपए की पहली किस्त मिली। शेष निर्माण पूरा होने पर दूसरी किस्त देने का आश्वासन दिया गया था।
आर्थिक तंगी बनी सबसे बड़ी बाधा
मारक्का बताती हैं कि घर पूरा करने के लिए कम से कम 70 से 80 हजार रुपए की जरूरत है। मजदूरी से मिलने वाली आमदनी से परिवार चलाना ही मुश्किल है, ऐसे में अतिरिक्त पैसा जुटाना संभव नहीं हो पा रहा।
उन्होंने मजबूरी में अधूरे मकान के ऊपर नारियल की पत्तियों से अस्थायी छत बनाकर किसी तरह गुजारा शुरू कर दिया है।
सरकार से मदद की गुहार
मारक्का की बेटी शिल्पा ने सरकार से अपील की है कि अधूरे मकान का निर्माण पूरा कराया जाए और बाद में राशि वसूल ली जाए। साथ ही उन्होंने घर तक बिजली कनेक्शन और पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध कराने की भी मांग की है।
व्यवस्था पर सवाल
यह मामला सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करता है, जहां आर्थिक रूप से कमजोर परिवार योजना का लाभ मिलने के बावजूद अधूरे मकान में या झोपडिय़ों में रहने को मजबूर हैं।
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