कैबिनेट बैठक में नहीं उठा आइटी पार्क का मुद्दा, निगमों को अनुदान का इंतजार
डीसी मन्ना भूमि और कोरगा पुनर्वास की मांगें भी लंबित
मेंगलूरु। अविभाजित दक्षिण कन्नड़ जिला शिक्षा के क्षेत्र में राज्य के अग्रणी जिलों में शामिल है। हर साल हजारों विद्यार्थी डिग्री, स्नातकोत्तर और व्यावसायिक पाठ्यक्रम पूरा कर निकलते हैं। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की वर्षों पुरानी मांग—मेंगलूरु में आइटी पार्क की स्थापना—अब भी फाइलों में अटकी है। मेंगलूरु में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक से इस मुद्दे पर निर्णय की उम्मीद लगाए बैठे युवाओं को निराशा हाथ लगी।
करावली क्षेत्र में मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों की बड़ी संख्या है। हर साल बड़ी संख्या में प्रशिक्षित युवा तैयार होते हैं, लेकिन रोजगार के लिए उन्हें बेंगलूरु, मैसूरु, हैदराबाद और विदेशों का रुख करना पड़ता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर आइटी कंपनियों के लिए अनुकूल माहौल और आइटी पार्क की मांग लगातार उठती रही है।
40 हजार तक पहुंचा आइटी रोजगार
करावली में आइटी क्षेत्र ने पिछले कुछ वर्षों में तेजी से विस्तार किया है। 2020 के आसपास करीब 5 हजार आइटी कर्मचारियों की संख्या अब लगभग 40 हजार तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है। आइटी क्षेत्र का कारोबार भी करीब 500 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। उद्यमियों का कहना है कि सरकार की स्पष्ट नीति, बुनियादी ढांचे और प्रोत्साहन से इस क्षेत्र की रफ्तार और तेज हो सकती है।
डीसी मन्ना भूमि का मुद्दा भी अधूरा
पात्र लाभार्थियों को डीसी मन्ना भूमि वितरित करने के लिए निर्णय लेने की मांग भी पूरी नहीं हुई। भूमि आवंटन में आ रही कानूनी और तकनीकी अड़चनों को दूर करने के लिए कैबिनेट में चर्चा की उम्मीद थी। मुद्दा नहीं उठने से दलित संगठनों में नाराजगी है।
कोरगा पुनर्वास पर भी फैसला नहीं
आदिवासी समुदाय कोरगा के पुनर्वास की मांग को लेकर मुख्यमंत्री और संबंधित मंत्रियों को ज्ञापन दिए गए थे। मांग के समर्थन में जिलाधिकारी कार्यालय तक मौन मार्च भी निकाला गया। इसके बावजूद कैबिनेट में विषय चर्चा के लिए नहीं आने से समुदाय में निराशा है।
घोषणाएं हुईं, अनुदान का इंतजार
नारायणगुरु विकास निगम: घोषणा और अध्यक्ष की नियुक्ति हो चुकी, लेकिन अनुदान जारी नहीं।
बंट समुदाय/नाडवर विकास निगम: अब तक निगम की घोषणा नहीं।
काजू विकास निगम: अध्यक्ष नियुक्त, लेकिन अनुदान लंबित।
करावली विकास प्राधिकरण: अध्यक्ष नियुक्त, मगर बजट/अनुदान का इंतजार।
गाणिग विकास बोर्ड: अध्यक्ष नियुक्त, लेकिन अनुदान जारी नहीं।
सवाल यही है कि घोषणाओं और नियुक्तियों के बाद इन संस्थाओं को आर्थिक ताकत कब मिलेगी? करावली के युवाओं और विभिन्न समुदायों की लंबित मांगें अब केवल घोषणाओं के बजाय ठोस बजटीय निर्णय की प्रतीक्षा कर रही हैं।
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