दक्षिण कन्नड़ और उडुपी में अतिरिक्त आधिकारिक प्रशासनिक भाषा के रूप में लागू होगा तुलु
विभागीय फाइलों, आवेदन और अधिसूचनाओं में इस्तेमाल का रास्ता साफ
तुलु साहित्य अकादमी के प्रथम अध्यक्ष प्रो. बी.ए. विवेक राई बोले—अधिकारियों को भी मिले तुलु भाषा का प्रशिक्षण, तैयार हो प्रशासनिक शब्दावली
मेंगलूरु। दो हजार वर्ष से अधिक पुरानी तुलु भाषा अब दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों के सरकारी कामकाज में औपचारिक जगह बनाने जा रही है। 18 सितंबर को मेंगलूरु में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में तुलु को कर्नाटक की अतिरिक्त आधिकारिक प्रशासनिक भाषा का दर्जा देने और दक्षिण कन्नड़ व उडुपी जिलों में इसे लागू करने का निर्णय लिया गया।
इस फैसले के बाद सरकारी कामकाज में तुलु के इस्तेमाल को लेकर नई संभावनाएं पैदा हुई हैं। कर्नाटक तुलु साहित्य अकादमी के प्रथम अध्यक्ष और हम्पी कन्नड़ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. बी.ए. विवेक राई के अनुसार, कन्नड़ राज्य की आधिकारिक भाषा बनी रहेगी, जबकि अतिरिक्त आधिकारिक भाषा के रूप में तुलु को प्रशासनिक इस्तेमाल का अवसर मिलेगा।
विभागीय फाइलों और आवेदनों में तुलु
प्रो. विवेक राई के अनुसार, जिस तरह प्रशासनिक कामकाज में कन्नड़ का इस्तेमाल होता है, उसी तरह अविभाजित दक्षिण कन्नड़ क्षेत्र में तुलु का भी उपयोग किया जा सकेगा। विभागीय कामकाज, फाइलों, आवेदनों और अधिसूचनाओं में तुलु के इस्तेमाल की व्यवस्था विकसित करनी होगी। स्थानीय निकायों में भी तुलु में संवाद की सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है।

अधिकारियों को देना होगा भाषा प्रशिक्षण
करावली क्षेत्र में नियुक्त होने वाले आईएएस और आईपीएस अधिकारियों समेत अन्य अधिकारियों के लिए तुलु भाषा प्रशिक्षण की व्यवस्था करने की जरूरत होगी। प्रो. राई के अनुसार, बाहरी राज्यों से आने वाले अधिकारियों को जैसे मैसूरु में कन्नड़ प्रशिक्षण दिया जाता है, उसी तरह मेंगलूरु में तुलु प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया जाना चाहिए।
तैयार करनी होगी प्रशासनिक शब्दावली
तुलु को प्रशासन में लागू करने के लिए सबसे पहले प्रशासनिक तुलु शब्दकोश तैयार करने की जरूरत होगी। सरकारी कामकाज में इस्तेमाल होने वाले कन्नड़ और अंग्रेजी शब्दों के तुलु विकल्प तैयार करने के लिए विद्वानों की मदद से अध्ययन करना होगा।
प्रो. राई के अनुसार, तुलु की उडुपी, कार्कल, मेंगलूरु और पुत्तूर-सुल्या क्षेत्र में अलग-अलग बोलियां हैं। इसलिए प्रशासन और शिक्षा के लिए एक मानक यानी शिष्ट तुलु विकसित करना जरूरी होगा।
तालुक स्तर पर बनें तुलु संसाधन केंद्र
उन्होंने प्रत्येक तालुक मुख्यालय में तुलु संसाधन केंद्र स्थापित करने का सुझाव दिया है। इन केंद्रों के जरिए तुलु में आवेदन प्रारूप तैयार करने, अनुवादक और प्रशिक्षक तैयार करने, शब्दकोश के प्रचार तथा भाषा संबंधी मार्गदर्शन की व्यवस्था की जा सकती है।
उनके अनुसार, सरकार को अनुवादकों और प्रशिक्षकों को मानदेय या वेतन देना चाहिए। इससे भाषा के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
तुलु को मिले दर्जे का लाभ उठाना अब तुलुवासियों के हाथ में
प्रो. विवेक राई ने कहा कि सरकार ने तुलु को मान्यता दी है और अब इस अवसर का प्रभावी इस्तेमाल करना तुलुवासियों की जिम्मेदारी है। इसके लिए निरंतर अभियान और संस्थागत प्रयास जरूरी होंगे। उनके अनुसार, तुलु को अतिरिक्त आधिकारिक दर्जा मिलने से कन्नड़ को नुकसान नहीं होगा, बल्कि इससे भाषाई विविधता और समृद्ध होगी।
उन्होंने कहा कि करीब 50 वर्ष पहले तुलु अकादमी बनाने की मांग उठी थी। इसके बाद संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने और फिर आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की मांग सामने आई। राज्य सरकार का मौजूदा फैसला इस लंबे प्रयास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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