2026 का परिसीमन विधेयक
कांग्रेस नेता रजत उल्लागड्डीमठ ने केंद्र के प्रस्ताव पर उठाए गंभीर सवाल, दक्षिण राज्यों के हितों की अनदेखी का आरोप
हुब्बल्ली. केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित 2026 के परिसीमन विधेयक को लेकर कर्नाटक में राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। कांग्रेस नेता रजत उल्लागड्डीमठ ने इसे केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि दक्षिण भारत विशेषकर कर्नाटक के राजनीतिक अस्तित्व को कमजोर करने की साजिश बताया है।
“सफलता की सजा दी जा रही”
रजत उल्लागड्डीमठ ने कहा कि कर्नाटक ने बीते दशकों में जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके बावजूद, यदि लोकसभा सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो यह उन राज्यों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया है। उनके अनुसार, यह “सफलता को दंड और विफलता को पुरस्कार” देने जैसा है।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटने की आशंका
उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश और कर्नाटक के बीच लोकसभा सीटों का अंतर 52 से बढक़र 78 तक हो सकता है। इससे कर्नाटक और अन्य दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक आवाज कमजोर हो जाएगी और राष्ट्रीय निर्णयों में उनका प्रभाव घटेगा।
आर्थिक योगदान के बावजूद उपेक्षा
रजत ने कहा कि दक्षिण भारत देश के जीडीपी में लगभग 30 प्रतिशत योगदान देता है और कर्नाटक उच्च कर देने वाले राज्यों में शामिल है। बावजूद इसके, परिसीमन के बाद राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटने से केंद्र से मिलने वाले संसाधनों पर भी असर पड़ सकता है।
पुराने आंकड़ों के उपयोग पर सवाल
उल्लागड्डीमठ ने 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने के प्रस्ताव को अवैज्ञानिक बताया। उनका कहना है कि नवीनतम आंकड़ों के बजाय पुराने डेटा का उपयोग राज्यों के बीच असंतुलन बढ़ाएगा।
न्यायिक चुनौती का अभाव चिंता का विषय
उन्होंने यह कहा कि परिसीमन आयोग के निर्णयों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती, जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है।
सर्वदलीय विरोध की अपील
कांग्रेस नेता ने कर्नाटक सरकार और सभी नागरिकों से इस प्रस्ताव का विरोध करने की अपील की। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रतिनिधित्व तय करते समय केवल जनसंख्या ही नहीं, बल्कि आर्थिक योगदान, शिक्षा और विकास सूचकांकों को भी आधार बनाना चाहिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस प्रस्ताव को लागू किया गया, तो राज्यभर में जनजागरण और विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे। उनके शब्दों में, “कन्नड़ की आवाज दिल्ली में कमजोर नहीं होनी चाहिए और कन्नडिग़ों के अधिकारों की बलि नहीं दी जा सकती।”
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