कोहिनूर से नटराज तक, वापसी की लंबी लड़ाई जारी
सदियों की लूट के बाद अब सांस्कृतिक विरासत वापस लाने की मुहिम तेज
हुब्बल्ली: भारत की प्राचीन सभ्यता, कला और सांस्कृतिक वैभव की पहचान रही अनेक दुर्लभ कलाकृतियां आज भी दुनिया के विभिन्न संग्रहालयों में प्रदर्शित हैं। विदेशी आक्रमणों और ब्रिटिश शासन के दौरान देश से बाहर ले जाई गई इन अमूल्य धरोहरों को वापस लाने के लिए भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों में तेज कूटनीतिक प्रयास कर रही है।
विशेष रूप से वर्ष 2014 के बाद इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और अब तक 650 से अधिक भारतीय कलाकृतियां विदेशों से वापस लाई जा चुकी हैं।
1. कोहिनूर हीरा : सबसे चर्चित धरोहर
ब्रिटिश राजमुकुट में जड़ा है भारत का गौरव
दुनिया के सबसे प्रसिद्ध हीरों में शामिल 105 कैरेट का कोहिनूर हीरा वर्तमान में ब्रिटेन के टॉवर ऑफ लंदन स्थित शाही आभूषण संग्रह में रखा गया है।
यह हीरा मूल रूप से आंध्र प्रदेश की कोल्लूर खदानों से निकला माना जाता है। मुगल शासकों, नादिर शाह और महाराजा रणजीत सिंह के हाथों से गुजरते हुए यह अंतत: 1849 के लाहौर समझौते के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्जे में चला गया। बाद में इसे महारानी विक्टोरिया को सौंप दिया गया।
करीब 176 वर्षों से यह भारत से बाहर है और इसकी वापसी को लेकर आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है।
2. सुल्तानगंज बुद्ध प्रतिमा
बिहार से इंग्लैंड पहुंची विशाल ताम्र प्रतिमा
बिहार के सुल्तानगंज में रेलवे निर्माण के दौरान 19वीं सदी में मिली भगवान बुद्ध की विशाल ताम्र प्रतिमा आज ब्रिटेन के बर्मिंघम म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी में रखी गई है।
करीब 2.3 मीटर ऊंची यह प्रतिमा गुप्तकालीन कला का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है। इसे ब्रिटिश इंजीनियर ई.बी. हैरिस द्वारा इंग्लैंड भेजा गया था।
3. अमरावती शिल्प संपदा
बौद्ध विरासत का बड़ा हिस्सा लंदन में
आंध्र प्रदेश के अमरावती स्तूप से निकाली गई 120 से अधिक दुर्लभ बौद्ध शिल्पकृतियां आज लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित हैं।
1880 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने उत्खनन के नाम पर इन मूर्तियों और पत्थर की नक्काशियों को भारत से बाहर भेज दिया था। इन्हें भारतीय बौद्ध कला की सर्वोत्तम धरोहरों में गिना जाता है।
4. टीपू सुल्तान का ‘टाइगर’
युद्ध की लूट बनकर पहुंचा लंदन
1799 में श्रीरंगपट्टण युद्ध के बाद ब्रिटिश सेना टीपू सुल्तान के महल से उनकी प्रसिद्ध ‘टाइगर’ कलाकृति अपने साथ ले गई।
लकड़ी से बनी यह यांत्रिक कलाकृति एक अंग्रेज सैनिक पर हमला करते बाघ को दर्शाती है। वर्तमान में यह लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में रखी गई है।
5. चोलकालीन नटराज मूर्तियां
मंदिरों से चोरी कर विदेशों में बेची गईं दुर्लभ प्रतिमाएं
तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों से चोरी की गई चोलकालीन कांस्य नटराज और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां अमेरिका, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के संग्रहालयों तक पहुंच गईं।
अंतरराष्ट्रीय कला तस्कर सुभाष कपूर और उसके नेटवर्क ने नकली दस्तावेजों के जरिए इन प्रतिमाओं को करोड़ों रुपए में बेचा था।
भारत सरकार की वापसी मुहिम तेज
2014 के बाद तेज हुई कार्रवाई
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) अब विदेशों में मौजूद भारतीय धरोहरों की पहचान और वापसी के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।
सरकार ने डिजिटल डेटाबेस तैयार करना शुरू किया है। इंटरपोल और विभिन्न देशों की एजेंसियों के सहयोग से चोरी की कलाकृतियों का पता लगाया जा रहा है।
बड़ी सफलताएं भी मिलीं
कई दुर्लभ मूर्तियां लौट चुकीं भारत
2021 में कनाडा से देवी अन्नपूर्णा की दुर्लभ प्रतिमा वापस लाई गई।
ऑस्ट्रेलिया से चोलकालीन नटराज प्रतिमा भारत को सौंपी गई।
ब्रिटिश म्यूजियम में रखी यक्षी प्रतिमा 1986 में भारत वापस लाई गई।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2014 से पहले केवल 13 प्राचीन वस्तुएं ही भारत लौट पाई थीं, जबकि पिछले एक दशक में 650 से अधिक धरोहरों की वापसी संभव हुई है।
कानूनी और कूटनीतिक चुनौतियां बरकरार
कोहिनूर जैसे मामलों में राह आसान नहीं
विशेषज्ञों के अनुसार, 1970 से पहले विदेश ले जाई गई वस्तुओं को वापस लाना कानूनी रूप से बेहद जटिल है। यूनेस्को कन्वेंशन 1970 के बाद चोरी हुई वस्तुओं पर ही प्रभावी माना जाता है।
इसके अलावा ब्रिटेन सहित कई देशों के संग्रहालय कानून भी राष्ट्रीय संग्रहालयों में रखी वस्तुओं की स्थायी वापसी को सीमित करते हैं।
सांस्कृतिक विरासत बचाने पर वैश्विक सहयोग
भारत ने अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जर्मनी सहित कई देशों के साथ सांस्कृतिक संपत्तियों की सुरक्षा और वापसी को लेकर समझौते किए हैं।
जी-20 मंच पर भी भारत ने सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी का मुद्दा प्रमुखता से उठाया है। इसके परिणामस्वरूप अब कई देश स्वयं आगे आकर भारतीय कलाकृतियां लौटाने लगे हैं।
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