हल्गन्नड़ के संरक्षण और प्रभावी शिक्षण पर कार्यशाला
नई पीढ़ी को भाषा से जोडऩे पर जोर
धारवाड़. कर्नाटक विश्वविद्यालय में आयोजित ‘हल्गन्नड़ (प्राचीन कन्नड़) पठन एवं शिक्षण पद्धति’ विषयक एक दिवसीय कार्यशाला में प्राचीन कन्नड़ भाषा के संरक्षण, संवर्धन और प्रभावी अध्यापन पर मंथन हुआ। वक्ताओं ने नई पीढ़ी को हल्गन्नड़ से जोडऩे की आवश्यकता पर बल दिया।
भाषा से जुड़ाव जरूरी
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ए.एम. खान ने कहा कि हल्गन्नड़ का अध्ययन और उसे सरल रूप में विद्यार्थियों तक पहुंचाना समय की मांग है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहें, बल्कि विद्यार्थियों को भाषा, साहित्य और संस्कृति की गहराई से भी परिचित कराएं।
रुचि और समर्पण से आसान होगा अध्ययन
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शांतिनाथ दिब्बद ने कहा कि भाषा मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। भाषा की गहराई को समझे बिना समृद्ध साहित्य की रचना संभव नहीं है। हल्गन्नड़ कठिन नहीं, बल्कि इसे सीखने के लिए रुचि, समर्पण और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता है।
कन्नड़ एवं संस्कृति विभाग के संयुक्त निदेशक के.एच. चन्नूर ने बताया कि विद्यार्थियों में हल्गन्नड़ के प्रति बनी कठिन धारणा को दूर करने और शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण पद्धति से परिचित कराने के उद्देश्य से यह कार्यशाला आयोजित की गई। इस अवसर पर कई विद्वान उपस्थित रहे तथा सेवानिवृत्त प्राध्यापकों और पीएचडी उपाधि प्राप्त कन्नड़ शिक्षकों का सम्मान किया गया।
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