कस्तूरीरंगन रिपोर्ट से गांव उजड़ने का डरपश्चिमी घाट।

कुंदापुर, उत्तर कन्नड़ और पुत्तूर में ग्रामीणों की चिंता

खेती, मकान, सडक़ और मूलभूत सुविधाओं पर प्रतिबंध की आशंका

कुंदापुर/सिरसी/पुत्तूर। पश्चिमी घाट क्षेत्र में कस्तूरीरंगन रिपोर्ट लागू किए जाने की आशंका से कर्नाटक के विभिन्न गांवों में ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है। कुंदापुर तालुक के चित्तूर और आलूर, उत्तर कन्नड़ जिले के 567 गांव तथा पुत्तूर के कौक्राड़ी और गोळित्तूट्टू के ग्रामीणों ने कृषि, आवास और बुनियादी सुविधाओं पर संभावित प्रतिबंधों को लेकर विरोध जताया है।

‘खेती छिनी तो हम कहां जाएंगे?’

कुंदापुर के आलूर और चित्तूर के ग्रामीणों का कहना है कि पीढिय़ों से सुपारी, नारियल और धान की खेती ही उनकी आजीविका है। ग्रामीणों के अनुसार, रिपोर्ट लागू होने पर कृषि भूमि, सडक़ और विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं।

चित्तूर में 791 घर और करीब 3,500 से 4,000 की आबादी है। गांव का बड़ा हिस्सा जंगल से घिरा है। ग्रामीण गोपाल नायक ने बताया कि कई संपर्क सडक़ें अब भी कच्ची हैं और रिपोर्ट लागू होने पर सडक़ विकास की उम्मीद भी प्रभावित हो सकती है।

आलूर में करीब 12 हजार आबादी और 1,200 से अधिक घर हैं। ग्रामीणों ने जल परियोजनाओं तथा अन्य विकास कार्यों में पर्यावरणीय प्रतिबंधों के कारण देरी की आशंका जताई है।

‘कृषि भूमि को जंगल कैसे माना जा सकता है?’

चित्तूर के चिकित्सक डॉ. अतुल कुमार शेट्टी ने कहा कि कृषि क्षेत्र को जंगल की श्रेणी में शामिल करना व्यावहारिक नहीं है। वन्यजीवों की समस्या से किसान पहले ही परेशान हैं। नए प्रतिबंध उनकी मुश्किलें और बढ़ा देंगे।

ग्रामीणों के अनुसार, चित्तूर का ब्रह्मलिंगेश्वर मंदिर, मारणकट्टे सहित कई धार्मिक स्थल, विद्यालय, आंगनवाड़ी केंद्र, ग्राम पंचायत और राजस्व कार्यालय भी संभावित प्रभाव क्षेत्र में आ सकते हैं।

उत्तर कन्नड़ में एक लाख आपत्तियां भेजने की तैयारी

सिरसी: राज्य वन भूमि अधिकार संघर्ष समिति ने कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के आधार पर जारी सातवीं अधिसूचना के विरोध में उत्तर कन्नड़ से केंद्र सरकार को एक लाख से अधिक आपत्ति पत्र भेजने का निर्णय लिया है।

समिति अध्यक्ष रविंद्र नायक के अनुसार, कर्नाटक के 10 जिलों के 1,502 गांवों को पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र में शामिल किया गया है। इनमें उत्तर कन्नड़ के नौ तालुकों के 567 गांव हैं। सिरसी के 114, सिद्धापुर के 100, जोयडा के 88 और यल्लापुर के 84 गांव प्रस्तावित सूची में हैं।

समिति ने आरोप लगाया कि उपग्रह सर्वेक्षण में सुपारी, नारियल और अन्य कृषि-बागवानी क्षेत्रों को भी हरित क्षेत्र मान लिया गया है। स्थानीय स्तर पर भौतिक सर्वेक्षण किए बिना क्षेत्र निर्धारित करना अव्यावहारिक है।

20 अगस्त को सिरसी में बैठक कर आगे के आंदोलन की रणनीति तय की जाएगी।

‘जंगल बचाइए, हमें भी जीने दीजिए’

पुत्तूर: कौक्राड़ी और गोळित्तूट्टू के ग्रामीणों ने भी रिपोर्ट को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि दो राष्ट्रीय राजमार्गों से जुड़े इन गांवों में कृषि और आबादी वाले क्षेत्रों पर प्रतिबंध लगा तो लोगों का जीवन कठिन हो जाएगा।

गोळित्तूट्टू जनहित संरक्षण मंच के अध्यक्ष ए.एस. शेखर गौड़ा ने कहा कि जंगलों की रक्षा के लिए कठोर कानून बनाइए, वन्यजीवों की सुरक्षा कीजिए, लेकिन हमें भी जीने दीजिए।

ग्रामीणों ने भूमि परिवर्तन, मकान निर्माण, सडक़ विकास और सरकारी अनुदानों पर संभावित रोक की आशंका जताई है। कौक्राड़ी के नागेश गौड़ा नलियाल ने सवाल किया कि जिन गांवों को रिपोर्ट के दायरे से बाहर रखा गया है, उन्हें किस आधार पर बाहर किया गया? हमारे गांवों को ही इसके दायरे में क्यों लाया गया?

ग्रामीणों की मांग है कि कृषि और आबादी वाले क्षेत्रों को प्रस्तावित दायरे से बाहर रखा जाए तथा निर्णय लेने से पहले स्थानीय स्तर पर वास्तविक स्थिति का भौतिक सर्वेक्षण कराया जाए। साथ ही विद्यालय, सडक़, बैंक, स्वास्थ्य और अन्य मूलभूत सुविधाओं के विकास पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई जाए।

 

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By Bharat Ki Awaz

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