‘जंगल बचाइए, हमारा जीवन मत छीनिए’पश्चिमी घाट।

कस्तूरीरंगन रिपोर्ट से फिर सहमा सवणालु-शिरलालु

कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान की पुरानी यादों से डरे ग्रामीण

250 से अधिक आपत्तियां दाखिल, मूलभूत सुविधाओं की कमी से पहले ही जूझ रहे लोग

बेल्तंगडी (दक्षिण कन्नड़)। पश्चिमी घाट की गोद में बसे बेल्तंगडी तालुक के सवणालु और शिरलालु गांवों में कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को लेकर चिंता गहराती जा रही है। घने जंगल, पहाड़ों की श्रृंखलाएं, झरने और हरियाली इन गांवों की पहचान हैं, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि विकास के नाम पर उन्हें कुछ खास नहीं मिला। अब नई रिपोर्ट के कारण कहीं उनकी जमीन और आजीविका पर ही संकट न आ जाए, यही भय उन्हें सता रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान योजना के समय भी कई आश्वासन दिए गए थे। लेकिन बाद के अनुभवों ने उन आश्वासनों पर सवाल खड़े कर दिए। इसलिए कस्तूरीरंगन रिपोर्ट लागू होने की चर्चा ने पुराने डर को फिर जगा दिया है।
ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि अतिरिक्त सुविधाएं नहीं देंगे तो भी चलेगा, लेकिन हमारा जीवन और जमीन हमसे मत छीनिए। पर्यावरण की रक्षा कीजिए, हमें हमारी जमीन पर रहने दीजिए।

पीढिय़ों से इसी मिट्टी पर टिका जीवन

करीब 1,500 घरों वाले सवणालु और शिरलालु में कई मंदिर, दैवस्थल और मस्जिदें हैं। ग्रामीणों की चिंता है कि यदि प्रतिबंध बढ़े तो इन धार्मिक और सामाजिक केंद्रों का भविष्य भी प्रभावित हो सकता है।

सवणालु में दो आंगनवाड़ी, दो प्राथमिक विद्यालय और एक हाईस्कूल हैं। शिरलालु में चार आंगनवाड़ी और एक उच्च प्राथमिक विद्यालय संचालित हैं। कॉलेज शिक्षा के लिए युवाओं को अलदंगडी या बेल्तंगडी जाना पड़ता है। कुछ युवा शिक्षा के बाद बाहर रोजगार तलाश चुके हैं, जबकि कई अब भी खेती पर निर्भर हैं।

यहां सुपारी, नारियल, केला, काली मिर्च, रबर और कुछ क्षेत्रों में धान की खेती होती है। कई परिवार पशुपालन तथा बीड़ी बनाने से भी आजीविका चलाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार क्षेत्र में तेंदुओं और जंगली भैंसों की आवाजाही बढऩा भी एक चुनौती है।

मलेकुडिया समुदाय के सामने असुरक्षा

सवणालु का कुछ हिस्सा कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान के दायरे में आता है। पहले से ही बिजली और सडक़ जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी झेल रहे लोगों के लिए कस्तूरीरंगन रिपोर्ट नई चिंता बन गई है।

हित्तिलपेल क्षेत्र के नौ आदिवासी मलेकुडिया परिवारों के संबंध में अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी वे बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। बिजली और सडक़ संपर्क की कमी के साथ बहने वाले नाले पर पुल भी नहीं है। बारिश के मौसम में तेज वर्षा होने पर बाहरी दुनिया से संपर्क तक टूट जाता है। पुल निर्माण के लिए कई बार आवेदन दिए जाने के बावजूद समस्या जस की तस है।

‘जमीनी हकीकत समझे सरकार’

आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे सवणालु के जयआनंद पिलिकल ने कहा कि कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान योजना लागू करने से पहले भी लोगों को घर और विकास कार्यों में परेशानी नहीं होने का भरोसा दिया गया था, लेकिन आज की स्थिति उन आश्वासनों की वास्तविकता बताती है।

उनका आरोप है कि किसी योजना को लागू करने से पहले लोगों को परेशानी न होने की बात कही जाती है, लेकिन बाद में धीरे-धीरे प्रतिबंध बढ़ते जाते हैं और लोगों के जीवन के अधिकार पर असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि योजनाएं वातानुकूलित कमरों में बैठकर तैयार करने के बजाय अधिकारियों को गांवों में आकर जमीनी हकीकत समझनी चाहिए।

गांव में पक्की सडक़ें अब भी सपना

हरियाली से घिरे गांव देखने में भले ही सुंदर हों, लेकिन आवागमन की स्थिति खराब है। कई अंदरूनी सडक़ें अब भी कच्ची हैं। बारिश के दौरान ये सडक़ें कीचड़ और गड्ढों में बदल जाती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से बार-बार शिकायत के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ।

‘बस्ती प्रभावित न हो’

कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को लेकर दोनों गांवों के लोगों ने अभी से अपनी आपत्तियां दर्ज करानी शुरू कर दी हैं। 250 से अधिक लोगों ने रिपोर्ट के खिलाफ आपत्तियां दाखिल की हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि गांव हमारी सांस है और खेती हमारा जीवन। जनवस्ती वाले क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाए बिना पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाए जाएं तो हमें आपत्ति नहीं है। लेकिन हमारी भावनाओं और जीवन के अधिकार को भी महत्व देना चाहिए।

एक सुर में ग्रामीणों की मांग

ग्रामीणों का कहना है कि वे सदियों से जंगल और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रह रहे हैं। पश्चिमी घाट का संरक्षण जरूरी है और वे इसके विरोध में नहीं हैं। लेकिन संरक्षण की आड़ में लोगों को उनके पुश्तैनी गांवों से विस्थापित नहीं करना चाहिए। प्रकृति भी बचे और इंसान का जीवन भी। जंगल की रक्षा हो, लेकिन ऐसी स्थिति न बने कि मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़े या लोगों को अपना जन्मस्थान छोडऩा पड़े।

 

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By Bharat Ki Awaz

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