हावेरी-गदग की लाखों एकड़ जमीन को सिंचाई की उम्मीद
पश्चिमी घाट के पर्यावरण और बदलते मानसून ने बढ़ाए गंभीर सवाल
सिरसी। पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में मिलने वाली बेडती नदी के अतिरिक्त पानी को पूर्व की ओर बहने वाली वरदा नदी में मोडऩे की प्रस्तावित योजना उत्तर कर्नाटक की पानी की प्यास बुझाने की बड़ी उम्मीद मानी जा रही है। योजना के तहत करीब 7.5 से 10 टीएमसी पानी बेडती से वरदा नदी की ओर मोडऩे का प्रस्ताव है। इससे हावेरी, गदग, धारवाड़ और उत्तर कन्नड़ के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल सुविधा बढऩे की उम्मीद है।
योजना के तहत बेडती पर बांध बनाकर सुरंगों और नहरों के जरिए पानी को गुरुत्वाकर्षण या पंपिंग प्रणाली से वरदा अथवा उसकी सहायक नदियों तक पहुंचाने की परिकल्पना है। दावा है कि इससे लाखों एकड़ कृषि भूमि को सिंचाई मिल सकती है और सैकड़ों गांवों तथा शहरों की पेयजल सुरक्षा मजबूत हो सकती है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल पानी की उपलब्धता का ही है। बेडती और वरदा दोनों नदियों में गर्मियों के दौरान जलस्तर काफी घट जाता है। ऐसे में यह परियोजना मूलत: मानसून के चार-पांच महीनों में उपलब्ध अतिरिक्त पानी पर निर्भर होगी। अनुमान के अनुसार मानसून में बेडती में 20-30 टीएमसी से अधिक पानी उपलब्ध हो सकता है, जिसमें से करीब 30 प्रतिशत यानी 7.5-10 टीएमसी मोडऩे की योजना है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
पश्चिमी घाट के संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्र में परियोजना होने से वन, जैव विविधता, मछलियों और स्थानीय जलस्रोतों पर प्रभाव को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों ने चिंता जताई है।
सबसे अहम सवाल यह है कि यदि बदलते मौसम के कारण मानसून में ही बेडती में अपेक्षित पानी नहीं आया तो परियोजना के लिए पानी कहां से आएगा। इसलिए केवल कागजी जल उपलब्धता के आधार पर नहीं, बल्कि दीर्घकालीन नदी प्रवाह, मानसून परिवर्तन, पर्यावरणीय प्रभाव और वैज्ञानिक जल-विज्ञान अध्ययन के आधार पर परियोजना की व्यवहार्यता तय करना महत्वपूर्ण होगा।
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