बंटवाल के सफाईकर्मी सेसप्पा की प्रेरक कहानी
50 रुपए की दिहाड़ी से शुरू सफर अब 35 लाख रुपए की कार तक
बंटवाल (दक्षिण कन्नड़)। सुबह के पांच बजते ही जब अधिकांश लोग नींद में होते हैं, बंटवाल के बी.सी. रोड पर एक फॉर्च्यूनर आकर रुकती है। कार से एक व्यक्ति उतरता है, हाथ में झाड़ू थामता है और सडक़ की सफाई में जुट जाता है। यह नजारा इसलिए खास है, क्योंकि फॉर्च्यूनर से उतरने वाला व्यक्ति कोई अधिकारी या कारोबारी नहीं, बल्कि नगरपालिका सफाईकर्मी सेसप्पा हैं।
1996 में महज 50 रुपए की दैनिक मजदूरी से सफाईकर्मी के रूप में काम शुरू करने वाले सेसप्पा आज करीब 35 लाख रुपए की फॉर्च्यूनर के मालिक हैं। लेकिन वाहन की कीमत से ज्यादा उल्लेखनीय है उनके हाथ में आज भी वही झाड़ू और अपने काम के प्रति सम्मान।
शराब छोड़ी, बदली जिंदगी
तीसरी कक्षा तक पढ़े सेसप्पा जीवन के एक दौर में व्यक्तिगत और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण शराब की लत के शिकार हो गए थे। वर्ष 2005 के बाद उन्होंने जिंदगी बदलने का दृढ़ संकल्प लिया। तत्कालीन एसआइ बेल्लियप्पा की प्रेरणा से शराब पूरी तरह छोड़ दी और मेहनत को जीवन का आधार बनाया।
इसके बाद उन्होंने एक-एक कर कारें खरीदीं। पहले छोटी कार, फिर ऑल्टो और स्कॉर्पियो के बाद हाल में दोनों वाहन देकर तथा ऋण लेकर फॉर्च्यूनर खरीदी।
सुबह सफाई, दोपहर में डेयरी और मजदूरी
सेसप्पा रोज सुबह पांच बजे काम पर पहुंचते हैं और दोपहर 12 बजे तक सडक़ सफाई सहित सौंपे गए कार्य पूरी जिम्मेदारी से करते हैं। जरूरत पडऩे पर उन्होंने कचरा निस्तारण वाहन चलाने की जिम्मेदारी भी संभाली है। इसके बाद वे डेयरी और मजदूरी के काम में जुट जाते हैं। डेयरी से उन्हें करीब 39 हजार रुपए मासिक आय होती है।
पिता के अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं थे पैसे
सेसप्पा के जीवन में संघर्ष के कठिन दौर भी रहे हैं। पिता के निधन के समय अंतिम संस्कार के लिए उनके पास पैसे नहीं थे और मदद करने वाला भी कोई नहीं था। उन्होंने स्वयं पिता का शव कंधे पर उठाकर नेत्रावती नदी के किनारे ले जाकर अंतिम संस्कार किया था।
“काम कोई छोटा नहीं”
सेसप्पा का कहना है कि मैंने जीवन में अनेक कठिनाइयां देखी हैं। अपने काम को पूरी श्रद्धा से करता हूं। साथ ही हर व्यक्ति की तरह सम्मानजनक जीवन जीने की इच्छा रखता हूं और इसी भावना से अपने बच्चों का पालन-पोषण किया है।
फॉर्च्यूनर में काम पर पहुंचने के बावजूद झाड़ू उठाने में संकोच न करना ही सेसप्पा की कहानी का सबसे बड़ा संदेश है—सम्मान काम से नहीं, काम के प्रति ईमानदारी से मिलता है।
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