देश के 80 प्रतिशत एंटी-वेनम के निर्माण में अहम योगदान
पारंपरिक कौशल से बचा रहे हजारों जान
कुंदापुर (उडुपी)। देश में हर साल सर्पदंश से होने वाली मौतों के बीच जीवनरक्षक दवा (एंटी-वेनम) तैयार करने में कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल का इरुल आदिवासी समुदाय महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। देश में प्रतिवर्ष आवश्यक करीब 15 लाख एंटी-वेनम शीशियों में से लगभग 80 प्रतिशत के लिए जहर इस समुदाय के लोग ही उपलब्ध कराते हैं।
सांप पकडऩे में हासिल है महारत
कर्नाटक में इरुलिग या इरुल नाम से पहचाना जाने वाला यह समुदाय अनुसूचित जनजाति में शामिल है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार कर्नाटक में इनकी आबादी 10,259 थी, जो मुख्यत: रामनगर, बेंगलूरु, हासन, चिक्कमगलूरु, शिवमोग्गा और तुमकूरु में निवास करती है। तमिलनाडु में यह दूसरा सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है, जहां इनकी संख्या 1.80 लाख से अधिक है। यह समुदाय नाग, करैत, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर जैसे अत्यधिक विषैले सांपों के पदचिह्नों और बिलों से उनकी पहचान कर आसानी से पकड़ लेता है।
जहर निकालकर सांपों को जंगल में छोडऩे की परंपरा
इरुल समुदाय पारंपरिक विधि से सांपों का जहर निकालता है और फिर सांप को एक पहचान चिह्न लगाकर वापस जंगल में सुरक्षित छोड़ देता है। उनका मानना है कि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए सांपों का जीवित रहना आवश्यक है। इसके अलावा, इन्हें औषधीय पौधों से उपचार का भी गहरा ज्ञान है। सांप पकडऩे के उत्कृष्ट कौशल के लिए समुदाय के वडिवेल गोपाल और मासी सदैयन को पद्मश्री से सम्मानित भी किया जा चुका है।
संरक्षण और अधिकारों के लिए संघर्ष
अभूतपूर्व योगदान के बावजूद यह समुदाय आज भी शिक्षा और आर्थिक मोर्चे पर पिछड़ा हुआ है। जंगलों से विस्थापन के कारण कई परिवार भूमिहीन मजदूर के रूप में जीवन बिता रहे हैं। वन अधिकार अधिनियम-2006 के क्रियान्वयन और भूमि अधिकारों को लेकर यह समुदाय निरंतर प्रयासरत है। स्थानीय प्रबुद्धजनों का मानना है कि इस समुदाय के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए सरकारों को विशेष ठोस योजनाएं लागू करनी चाहिए।
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