5,500 रुपए प्रति टन की मांग पर अड़े किसान
4,500 रुपए की न्यूनतम दर तय करने, कटाई-ढुलाई खर्च मिलों से वसूलने और 14 दिन में भुगतान की मांग
बेलगावी। कर्नाटक में गन्ने के उचित मूल्य को लेकर किसानों का आंदोलन निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। गन्ने का भाव तय होने तक चीनी की ढुलाई रोकने और मिलों के गोदामों पर ताला लगाने की चेतावनी के बीच किसान संगठनों ने सरकार तथा चीनी मिल प्रबंधन पर दबाव बढ़ा दिया है। बेलगावी जिले में 15 से अधिक चीनी मिलों के गोदामों का घेराव किया गया है। किसान प्रति टन गन्ने के लिए कुल 5,500 रुपए की मांग कर रहे हैं। इसमें राज्य सरकार से 1,000 रुपए प्रोत्साहन राशि और मिलों से कम से कम 4,500 रुपए देने की मांग शामिल है।
गुरलापुर में किसानों का रात-दिन का धरना चौथे दिन भी जारी रहा। प्रदर्शनकारियों ने निप्पाणी-मूडलगी राज्य राजमार्ग बंद कर विरोध जताया। किसान नेता चूनप्पा पुजेरी ने कहा कि उचित मूल्य तय होने तक चीनी की बिक्री और ढुलाई रोकने के लिए प्रदेशभर के गन्ना किसानों को एकजुट होना चाहिए। किसान संगठनों ने 31 अक्टूबर को बड़े आंदोलन की तैयारी भी शुरू कर दी है।
गोदामों का घेराव, ढुलाई रोकने की चेतावनी
किसानों ने सतीश शुगर्स, विश्वराज शुगर और पूर्व मंत्री श्रीमंत पाटिल की चीनी मिल सहित 15 से अधिक मिलों के गोदामों का घेराव कर मूल्य निर्धारण होने तक चीनी बाहर नहीं भेजने की मांग उठाई। किसान नेताओं के अनुसार, कुछ मिल प्रबंधनों ने उनके आग्रह पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। किसानों ने चीनी का बिक्री मूल्य 50 रुपए प्रति किलोग्राम से कम नहीं रखने की मांग भी की है।
केंद्र सरकार की समिति भी राज्य पहुंची है। किसान नेताओं चूनप्पा पुजेरी और शशिकांत गुरुजी को बेंगलूरु में चर्चा के लिए बुलाया गया है, लेकिन पुजेरी ने समिति से बेलगावी आकर किसानों की समस्याएं सुनने की मांग की है। उनका तर्क है कि उत्तर कर्नाटक, विशेषकर बेलगावी क्षेत्र, गन्ना उत्पादन का प्रमुख केंद्र है।
उत्पादन लागत 4,450 रुपए, न्यूनतम मूल्य 4,500 रुपए की मांग
इसी बीच राज्य गन्ना उत्पादक संघ ने उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) बढ़ाकर कम से कम 4,500 रुपए प्रति टन करने की मांग उठाई है। संघ के प्रदेशाध्यक्ष कुरुबुरु शांतकुमार ने नीति आयोग के सदस्य एवं चीनी तथा गन्ना किसानों की समस्याओं से संबंधित समिति के अध्यक्ष रमेश चंद्र को पत्र लिखकर किसानों के शोषण पर रोक लगाने की मांग की है।
संघ के अनुसार, कर्नाटक के गन्ना विकास आयुक्त की रिपोर्ट में एक टन गन्ने की उत्पादन लागत 4,450 रुपए बताई गई है। बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, बिजली और डीजल की बढ़ती लागत के मद्देनजर 10.25 प्रतिशत चीनी प्राप्ति के आधार पर एफआरपी कम से कम 4,500 रुपए प्रति टन तय करनी चाहिए।
कटाई-ढुलाई खर्च मिलों पर डालने की मांग
किसान संघ ने मशीन से कटाई के दौरान खराबी या अपशिष्ट के नाम पर 8 से 10 प्रतिशत तक वजन काटे जाने पर आपत्ति जताई है। संघ ने वैज्ञानिक जांच और वैधानिक मानकों के बिना ऐसी कटौती पर रोक लगाने तथा दोषी मिलों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। साथ ही, गन्ने का मूल्य खेत पर निर्धारित करने और कटाई व परिवहन का पूरा खर्च मिलों से वहन कराने का सुझाव दिया है।
संघ ने गन्ने की वास्तविक चीनी प्राप्ति के आधार पर उसी वर्ष का मूल्य तय करने, आपूर्ति के 14 दिन के भीतर भुगतान अनिवार्य करने और देरी होने पर ब्याज देने की मांग भी की है। बार-बार नियम तोडऩे वाली मिलों पर कार्रवाई तथा बकाया वसूली के लिए जिलाधिकारियों को प्रभावी कानूनी अधिकार देने की मांग पत्र में शामिल है।
उप-उत्पादों की कमाई में भी हिस्सा
किसानों का कहना है कि चीनी मिलों को शीरा, खोई, एथेनॉल और बिजली उत्पादन से भी आय होती है। इसलिए इन उप-उत्पादों से होने वाले लाभ में किसानों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। मिठाई उद्योग, शीतल पेय कंपनियों और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों जैसे व्यावसायिक उपभोक्ताओं के लिए चीनी की अलग और अधिक कीमत तय कर अतिरिक्त आय का लाभ भी किसानों तक पहुंचाने का प्रस्ताव रखा गया है।
किसानों ने स्पष्ट किया है कि उचित मूल्य पर सहमति बनने पर आंदोलन वापस लेने पर विचार किया जा सकता है, लेकिन मांगें पूरी नहीं होने पर प्रदर्शन और व्यापक होगा।
अब सरकार, मिल मालिकों और किसान प्रतिनिधियों के बीच होने वाली बातचीत से तय होगा कि गन्ने के दाम का विवाद सुलझता है या आंदोलन और तेज होता है।
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