बिजली शुल्क विवाद में भुगतान के बाद अब आम उपभोक्ताओं से वसूली की तैयारी
अंतिम फैसला बिजली अपीलीय न्यायाधिकरण में लंबित
उडुपी। अडाणी पावर की उडुपी पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) और कर्नाटक की बिजली वितरण कंपनियों के बीच लंबे समय से चल रहे बिजली शुल्क विवाद ने राज्य की एस्कॉम के सामने 1,000 करोड़ रुपए से अधिक की वित्तीय देनदारी खड़ी कर दी है। कंपनियां अब तक अडाणी पावर को करीब 1,005 करोड़ रुपए का भुगतान कर चुकी हैं। इस राशि का भार अंतत: बिजली उपभोक्ताओं पर पडऩे की आशंका है।
786 करोड़ रुपए का दावा बढक़र 1,005 करोड़ रुपए तक पहुंचा
विवाद यूपीसीएल की बिजली शुल्क गणना से जुड़ा है। अडाणी पावर ने 786 करोड़ रुपए के भुगतान का दावा किया था। इसमें 423 करोड़ रुपए का वहन शुल्क और 363 करोड़ रुपए का संचित ब्याज शामिल था। दूसरी ओर, कर्नाटक पावर कॉरपोरेशन और एस्कॉम ने गणना पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उनके अनुसार मूल देय राशि करीब 419 करोड़ रुपए थी।
इसके बावजूद एस्कॉम ने अडाणी पावर को कुल 1,005 करोड़ रुपए का भुगतान किया। ऊर्जा विभाग के अनुसार, इसमें अकेले बेंगलूरु विद्युत आपूर्ति कंपनी ने करीब 456 करोड़ रुपए यानी लगभग 45 प्रतिशत राशि का भुगतान किया है।
एफपीपीसीए के जरिए उपभोक्ताओं से वसूली
एस्कॉम ने पहले ही भुगतान की गई राशि को मासिक बिजली बिल में लगने वाले ईंधन एवं विद्युत खरीद लागत समायोजन के जरिए उपभोक्ताओं से वसूलना शुरू कर दिया है। कंपनियों ने मूल शुल्क पर लगे ब्याज की भी वसूली की अनुमति मांगी है।
हालांकि, कर्नाटक विद्युत नियामक आयोग ने चक्रवृद्धि ब्याज की पूरी वसूली को मान्यता देने से इनकार किया है। आयोग के अनुसार, एस्कॉम कानूनी रूप से केवल साधारण ब्याज की वसूली कर सकती हैं।
अंतिम फैसला एपीटीईएल के हाथ में
विवाद पर अंतिम फैसला बिजली अपीलीय न्यायाधिकरण (एपीटीईएल) में लंबित है। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने अगस्त में अडाणी पावर के चालान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। अब एपीटीईएल के अंतिम निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि भुगतान की गई राशि का कितना हिस्सा वैध देनदारी माना जाएगा और उपभोक्ताओं पर कितना भार डाला जा सकेगा।
1,200 मेगावाट का उडुपी संयंत्र
अडाणी पावर की सहायक कंपनी यूपीसीएल का कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र उडुपी जिले के एल्लूरु में स्थित है। इसकी कुल उत्पादन क्षमता 1,200 मेगावाट है। संयंत्र से उत्पादित बिजली का करीब 90 प्रतिशत कर्नाटक और 10 प्रतिशत पंजाब को आपूर्ति की जाती है।
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