अभिभावकों के सहयोग से बदली तस्वीर
उत्तरा कन्नड़ के यलकोट्टिगे स्कूल की सफलता की कहानी
ग्रामीणों की मेहनत से बना आधुनिक शिक्षण केंद्र
कारवार. उत्तर कन्नड़ जिले के होन्नावर तालुक में स्थित यलकोट्टिगे की प्राथमिक सरकारी स्कूल आज ग्रामीण एकजुटता और अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी की अनोखी मिसाल बन गई है। जंगल के किनारे स्थित इस छोटे से स्कूल ने सामुदायिक सहयोग से खुद को एक आदर्श सरकारी स्कूल के तौर पर विकसित कर लिया है।
करीब ढाई दशक पहले जब यह स्कूल शुरू हुआ था, तब ताड़ के पत्तों से बने छोटे से झोपड़ीनुमा भवन में केवल पांच-छह बच्चे पढ़ते थे। समय के साथ ग्रामीणों और अभिभावकों की मेहनत से आज यह स्कूल पक्के भवन, आधुनिक सुविधाओं और हंसते-खेलते बच्चों से भरा हुआ है।
स्कूल को आवश्यक सुविधाएं दिलाने के लिए गांव के लोगों ने सरकारी सहायता की प्रतीक्षा करने के बजाय स्वयं श्रमदान किया। इसी सामूहिक प्रयास के कारण स्कूल की स्कूल विकास एवं प्रबंधन समिति (एसडीएमसी) को इस वर्ष जिला स्तर का ‘सर्वश्रेष्ठ एसडीएमसी’ पुरस्कार भी मिला है।
कोविड काल में इस स्कूल ने एक अनोखी पहल की। होन्नावर-बेंगलूरु मुख्य सडक़ से करीब आठ किलोमीटर अंदर स्थित इस वन क्षेत्र के स्कूल तक ग्रामीणों ने स्वयं वाई-फाई इंटरनेट केबल पहुंचाई। इससे पूरे गांव को इंटरनेट सुविधा मिली और बच्चों के लिए डिजिटल कक्षाएं शुरू की जा सकीं।
स्कूल में नवोदय और आंबेडकर आवासीय विद्यालयों की प्रवेश परीक्षाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। साथ ही बच्चों को स्थानीय परंपराओं, पारंपरिक खेलों और सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जोड़ा जाता है।
स्कूल के पूर्व एसडीएमसी अध्यक्ष केशव गौड़ा के कार्यकाल में विकास की मजबूत नींव रखी गई, जिसे वर्तमान अध्यक्ष गणेश नायक आगे बढ़ा रहे हैं। स्कूल के मुख्याध्यापक सुब्राय शानभाग और शिक्षिका शोभा शानभाग के प्रयासों को भी अभिभावकों का पूरा सहयोग मिल रहा है।
वर्तमान में स्कूल में वाई-फाई, लैपटॉप, स्मार्ट टीवी, ग्रीन बोर्ड, खेल का मैदान, किचन गार्डन, सुंदर परिसर, कक्षाएं और शौचालय जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। हर वर्ष बच्चों को जंगल में वनों की सैर और ‘वनभोजन’ कार्यक्रम के माध्यम से प्रकृति और पर्यावरण से परिचित कराया जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समाज एकजुट होकर आगे आए, तो सरकारी स्कूलों को भी उत्कृष्ट शिक्षण संस्थान बनाया जा सकता है। यलकोट्टिगे स्कूल की कहानी यही संदेश देती है कि सरकारी स्कूलों को बचाने और आगे बढ़ाने की असली ताकत सरकार से ज्यादा जनता के हाथों में होती है।

