11वें तालुक कन्नड़ साहित्य सम्मेलन का शुभारंभ
ध्वजारोहण, शोभायात्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सजा आयोजन
हुब्बल्ली. शहर के लिंगराजनगर स्थित सांस्कृतिक समुदाय भवन में रविवार को 11वें हुब्बल्ली शहर तालुक कन्नड़ साहित्य सम्मेलन का आयोजन ध्वजारोहण और शोभायात्रा के साथ हुआ।
सम्मेलन की अध्यक्षता साहित्यकार स्नेहा वी. भूसनूर ने की। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के कारण लेखकों को लिखने के अधिक अवसर मिल रहे हैं और लिखने वालों की संख्या भी बढ़ रही है, लेकिन साहित्य में अपेक्षित गुणवत्ता दिखाई नहीं दे रही है।
भूसनूर ने कहा कि समकालीन सामाजिक समस्याओं पर साहित्य का अपेक्षित रूप से प्रतिक्रिया देना कम हो गया है। नई पीढ़ी को इतिहास, कला, साहित्य और संस्कृति की जानकारी नहीं है और यह स्थिति चिंताजनक है। समाज में महिलाएं पुरुषों के साथ कदम मिलाकर आगे बढ़ रही हैं, लेकिन उन्हें देखने का दृष्टिकोण अभी भी पूरी तरह नहीं बदला है। आज भी बड़ी संख्या में लड़कियों के लिए ज्ञान, रोजगार, स्वास्थ्य और सुरक्षा दूर का सपना बना हुआ है।
सम्मेलन का उद्घाटन कर कलबुर्गी की साहित्यकार जयश्री वीरन्ना दंडे ने कहा कि 12वीं शताब्दी में बसवन्ना और शरण संतों ने वचन साहित्य के माध्यम से कन्नड़ को शास्त्रीय भाषा का गौरव दिलाया। उसी परंपरा की बदौलत कन्नड़ भाषा आज भी जीवंत और सशक्त बनी हुई है।
इस अवसर पर कई पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया, जिनमें ‘नोवल्लरळिद हू नगु’, ‘वचन संगीत’, ‘बसवेश्वर-संपुट 5’, ‘बेवूर जनपद हाडुगलु’ और स्नेहा भूसनूर की कृति ‘बिसिलुंड अरिशिन’ का अंग्रेजी संस्करण शामिल है।
सम्मेलन में विभिन्न विचार गोष्ठियों, कवि सम्मेलन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया। शोधकर्ता जे.एम. नागय्या की अध्यक्षता में ‘आलोचना-विवेचना’ गोष्ठी हुई, जिसमें ‘साहित्य और सामाजिक परिवर्तन’ तथा ‘जनपद संस्कृति’ जैसे विषयों पर चर्चा की गई। कवि सम्मेलन में 15 से अधिक कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं।
सम्मेलन में पारित प्रस्तावों में प्राथमिक से सातवीं कक्षा तक कन्नड़ माध्यम अनिवार्य करने, केंद्र सरकार की प्रतियोगी परीक्षाओं में कन्नड़ भाषा को अवसर देने तथा कला-साहित्य अकादमियों को कन्नड़ और कर्नाटक की सांस्कृतिक अस्मिता के विकास के लिए सक्रिय रूप से कार्य करने की मांग शामिल है।
कार्यक्रम में अनेक साहित्यप्रेमी, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे।

