तावरेकोप्पा हादसे ने खोली व्यवस्था की पोल
वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
मंत्री ने माना-वन्यजीव उपचार के लिए कोई मानक प्रक्रिया नहीं
शिवमोग्गा. शहर स्थित तावरेकोप्पा टाइगर एवं लायन सफारी में युवा पशुचिकित्सक डॉ. समीक्षा रेड्डी की दर्दनाक मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उपचार के दौरान हाथी के हमले में उनकी मृत्यु ने यह उजागर किया है कि राज्य के मृगालयों में अब तक कोई स्पष्ट ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ (एसओपी) लागू नहीं है।
चौंकाने वाली बात यह है कि राज्य में मैसूर जैसे ऐतिहासिक मृगालय सहित कुल 9 अधिकृत चिडिय़ाघर होने के बावजूद, वन्यजीवों के उपचार, सुरक्षा प्रोटोकॉल और चिकित्सकीय प्रक्रिया को लेकर कोई लिखित मानक दिशा-निर्देश मौजूद नहीं हैं। इस गंभीर कमी को स्वयं वन मंत्री ईश्वर खंड्रे ने स्वीकार किया है, जिससे इस मुद्दे पर बहस और तेज हो गई है।
डॉ. रेड्डी की मौत के बाद पहले एसओपी के पालन की जांच की बात कही गई थी, लेकिन बाद में मंत्री के बयान ने नया मोड़ दे दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब तक न तो राज्य और न ही केंद्र स्तर पर वन्यजीवों के उपचार के लिए कोई आधिकारिक एसओपी तय किया गया है।
वन मंत्री ईश्वर खंड्रे ने कहा कि वन्यजीवों के उपचार के लिए अभी तक कोई लिखित एसओपी मौजूद नहीं है। अब महिला पशुचिकित्सकों सहित सभी चिकित्सकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल एसओपी तैयार कर उसे सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि एसओपी केवल कार्यप्रणाली तय करने का दस्तावेज नहीं, बल्कि जोखिम भरे हालात में जीवन रक्षक मार्गदर्शिका होती है। वन्यजीवों के इलाज के दौरान बेहोशी की प्रक्रिया, सुरक्षित दूरी, आपातकालीन निकासी और तकनीकी सहायता जैसे पहलुओं का स्पष्ट निर्धारण अत्यंत आवश्यक है।
घटना के बाद पशुचिकित्सकों में आक्रोश है। उनका कहना है कि बिना सुरक्षा उपकरणों और प्रशिक्षित टीम के उन्हें खतरनाक परिस्थितियों में भेजा जाता है। खासकर महिला चिकित्सकों के लिए रात के समय और जंगल क्षेत्रों में काम करना और भी जोखिमपूर्ण है।
गौरतलब है कि इससे पहले भी बांडीपुर और नागरहोले क्षेत्रों में इसी तरह के हादसे हो चुके हैं, जहां वन्यजीवों के हमलों में चिकित्सकों की जान गई थी। इसके बावजूद ठोस नीति का अभाव चिंता का विषय बना हुआ है।
विशेषज्ञों और पशुचिकित्सकों ने सरकार से मांग की है कि एसओपी को जल्द लागू किया जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की त्रासदियों को रोका जा सके। उनका कहना है कि वन्यजीवों की सुरक्षा जितनी जरूरी है, उतनी ही अहम उन चिकित्सकों की सुरक्षा भी है, जो उनकी जान बचाने में जुटे रहते हैं।
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