अंकसमुद्र पक्षी धाम में स्पॉट-बिल्ड पेलिकन की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धिस्पॉट-बिल्ड पेलिकन।

हगरिबोम्मनहल्ली (बल्लारी). तहसील के अंकसमुद्र पक्षीधाम में दुर्लभ मानी जाने वाली स्पॉट-बिल्ड पेलिकन प्रजाति की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी इस प्रजाति ने यहां आशाजनक वापसी की है, जो संरक्षण प्रयासों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2019 में इस पक्षीधाम में केवल एक जोड़ी पेलिकन ने एक घोंसला बनाकर अपना बसेरा शुरू किया था। लेकिन पिछले सात वर्षों में यह संख्या बढक़र सात घोंसलों तक पहुंच गई है। वर्तमान में इनका परिवार 100 से अधिक सदस्यों का हो चुका है, जो इस क्षेत्र के अनुकूल वातावरण और सुरक्षा का प्रमाण है।

पक्षी विशेषज्ञों के मुताबिक, इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की रिपोर्ट में इस प्रजाति को संकटग्रस्त बताया गया है, लेकिन अंकसमुद्र पक्षीधाम में इनकी संख्या हर साल बढ़ रही है। इसका मुख्य कारण यहां की समृद्ध जैव विविधता और अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र है।

करीब 245 एकड़ में फैले इस पक्षीधाम में ऊंचे पेड़-पौधों की भरमार है, जहां पेलिकन सुरक्षित रूप से घोंसले बनाकर प्रजनन कर रहे हैं। यहां किसी प्रकार का व्यवधान नहीं होने से पक्षियों को शांत वातावरण मिलता है। साथ ही, जलाशय में पर्याप्त मात्रा में मछलियां उपलब्ध हैं, जो इनके भोजन का प्रमुख स्रोत हैं।

पक्षी विशेषज्ञ विजय इट्टिगी का कहना है कि पक्षीधाम में सालभर पानी की उपलब्धता के कारण मछलियों की कमी नहीं होती। जलाशय के बीच बने टापूनुमा क्षेत्रों (नडुगड्डे) में पक्षियों ने अपना स्थायी आवास बना लिया है, जो उनके प्रजनन के लिए सुरक्षित और अनुकूल वातावरण प्रदान करता है।

विशेष बात यह है कि यहां केवल सर्दियों में आने वाले प्रवासी पक्षी ही नहीं, बल्कि भीषण गर्मी के दौरान भी 100 से अधिक देशी और विदेशी पक्षियों की प्रजातियां यहां डेरा डाले रहती हैं। इनमें प्रमुख रूप से पेंटेड स्टॉर्क, इंडियन कॉर्मोरेंट, लिटिल कॉर्मोरेंट, ओपन-बिल्ड स्टॉर्क, ग्लॉसी आइबिस, रोसी स्टार्लिंग, कैटल एग्रेट, स्पॉट-बिल्ड डक और व्हिसलिंग डक जैसी प्रजातियां शामिल हैं।

पक्षीधाम में पक्षियों की बढ़ती संख्या न केवल पर्यावरण संरक्षण की सफलता को दर्शाती है, बल्कि यह क्षेत्र भविष्य में एक प्रमुख इको-टूरिज्म केंद्र के रूप में भी विकसित हो सकता है।

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By Bharat Ki Awaz

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