समुद्री कटाव और आकाशीय बिजली का कहर
स्थायी समाधान अब भी दूर
करोड़ों रुपए खर्च के बावजूद तट क्षरण पर नियंत्रण नहीं
हर साल बिजली-तूफान से जन-धन की भारी हानि
उडुपी. जिले में मानसून के आगमन से पहले ही लोगों में प्राकृतिक आपदाओं को लेकर चिंता बढऩे लगी है। हर वर्ष की तरह इस बार भी समुद्री कटाव, आकाशीय बिजली और बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है, जिससे करोड़ों रुपए की संपत्ति और जनजीवन प्रभावित होने की आशंका है।
समुद्री कटाव पर करोड़ों रुपए खर्च, फिर भी राहत नहीं
मलपे बीच से लेकर हूडे और पडुकरे तटीय क्षेत्रों में समुद्र के बढ़ते कटाव को रोकने के लिए बड़े-बड़े पत्थर डाले गए हैं। अब तक 300 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन समुद्र की तेज लहरों के आगे ये प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। तटीय क्षेत्रों में लोगों की संपत्तियों को लगातार नुकसान हो रहा है, जिससे स्थायी समाधान की मांग तेज हो गई है।
आकाशीय बिजली का बढ़ता खतरा
मानसून और बाद के मौसम में तेज बिजली और गरज-चमक से मकानों, पशुओं और नारियल-सुपारी के पेड़ों को भारी नुकसान पहुंचता है। कई मामलों में जानमाल की हानि भी होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी अधिक बिजली गिरने के कारणों और इसके वैज्ञानिक समाधान पर अभी तक समुचित अध्ययन नहीं हुआ है।
बिजली विभाग को भारी नुकसान
तेज हवाओं और बिजली गिरने से विद्युत व्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित होती है। खंभे गिरना, ट्रांसफार्मर जलना और आपूर्ति बाधित होना आम हो गया है। पिछले मानसून में मेस्कॉम को लगभग 9.28 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था, जिसमें 5,500 से अधिक खंभे टूटे और करीब 70 किलोमीटर तार क्षतिग्रस्त हुए।
प्रशासन की तैयारियां और चुनौतियां
तहसीलदार आर. गुरुराज ने बताया कि फिलहाल पेयजल समस्या पर ध्यान दिया जा रहा है, जल्द ही मानसून पूर्व तैयारियों पर भी कार्य शुरू होगा। प्रशासन द्वारा टास्क फोर्स गठन, 24 गुणा 7 हेल्पलाइन, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में नाव और राहत केंद्र जैसी व्यवस्थाएं की जाती हैं, लेकिन हर साल की पुनरावृत्ति चिंता बढ़ा रही है।
विशेषज्ञों की राय
पर्यावरणविद् डॉ. सतीश नायक आलंबी ने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, लेकिन आधुनिक तकनीक और जनजागरूकता से नुकसान काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, उडुपी में मानसून से पहले ही खतरे की घंटी बज चुकी है। अब देखना होगा कि प्रशासन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण मिलकर इस चुनौती का कितना प्रभावी समाधान निकाल पाते हैं।
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