शून्य ब्याज ऋण योजना ठप
नाबार्ड फंड में कटौती से सहकारी संस्थाएं कमजोर
किसान निजी साहूकारों की ओर मजबूर
बेंगलुरु. कर्नाटक में किसानों के लिए राहत मानी जाने वाली शून्य ब्याज दर की ऋण योजना अब लगभग ठप पड़ती नजर आ रही है। सहकारी संस्थाओं के पास फंड की कमी के कारण किसानों को समय पर कर्ज नहीं मिल पा रहा है, जिससे वे निजी साहूकारों की ओर रुख करने को मजबूर हो रहे हैं।
नाबार्ड फंड कटौती से बिगड़ी स्थिति
नाबार्ड द्वारा सहकारी संस्थाओं को 4.5 प्रतिशत ब्याज पर दिए जाने वाले पुनर्वित्त (रिफाइनेंस) में वर्ष 2024-25 में करीब 58 प्रतिशत की कटौती के बाद हालात और बिगड़ गए हैं। पहले जहां राज्य को सालाना करीब 5600 करोड़ रुपए मिलते थे, वह घटकर लगभग 2300 करोड़ रुपए रह गया है। इसका सीधा असर किसानों को मिलने वाले शून्य और रियायती ब्याज वाले कर्ज पर पड़ा है।
लक्ष्य से पीछे ऋण वितरण
राज्य में लगभग 54 लाख पंजीकृत किसान सहकारी समितियों से जुड़े हैं, लेकिन इनमें से आधे से भी कम को कर्ज मिल पा रहा है।
2024-25 में 36 लाख किसानों को 27 हजार करोड़ रुपए कर्ज देने का लक्ष्य था, लेकिन केवल 19.21 लाख किसानों को 17,717 करोड़ रुपए ही वितरित हो सके।
इसी तरह 2025-26 में 38 लाख किसानों को 28 हजार करोड़ रुपए देने का लक्ष्य था, परन्तु 22,320 करोड़ रुपए ही वितरित हुए।
सहकारी संस्थाएं भी संकट में
सहकारी समितियां अब महंगे ब्याज (8 प्रतिशत तक) पर ऋण लेकर किसानों को कर्ज देने की स्थिति में नहीं हैं। लंबे समय तक पुनर्भुगतान का इंतजार और सीमित संसाधनों के कारण उनका कारोबार भी प्रभावित हो रहा है।
निजी कर्ज का बढ़ता जाल
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति जारी रही तो किसान फिर से निजी महाजनों के कर्ज के जाल में फंस सकते हैं, जिससे आत्महत्या जैसे मामलों में बढ़ोतरी की आशंका है।
क्या-क्या मिलना था कर्ज
अल्पकालीन फसल ऋण : 5 लाख रुपए तक शून्य ब्याज
मध्यम/दीर्घकालीन ऋण : 15 लाख रुपए तक 3 प्रतिशत ब्याज
वेयरहाउस (गोदाम) ऋण : 7 प्रतिशत ब्याज
वाहन ऋण : पहाड़ी क्षेत्रों में 7 लाख रुपए तक
सरकार के लिए चुनौती
सरकार ने 2026-27 में 38 लाख किसानों को 30 हजार करोड़ रुपए कर्ज देने का लक्ष्य रखा है, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए इसे हासिल करना बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, समय पर सस्ती दर पर कर्ज उपलब्ध न होने से किसानों की आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ रहा है और कृषि क्षेत्र में अस्थिरता बढऩे का खतरा मंडरा रहा है।
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