वन विभाग की एनओसी और पर्यावरणीय आपत्तियों के चलते 380 करोड़ की महत्वाकांक्षी योजना अटकी
उडुपी. जिले में कोल्लूर मूकांबिका मंदिर को पश्चिमी घाट के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोडचाद्री से जोडऩे वाली महत्वाकांक्षी रोपवे परियोजना पिछले पांच वर्षों से फाइलों में ही अटकी हुई है। करीब 380 करोड़ रुपए की लागत वाली इस परियोजना को केंद्र सरकार की ‘पर्वतमाला योजना’ के तहत मंजूरी मिली थी, लेकिन अब तक इसे अंतिम रूप नहीं मिल सका है।
राष्ट्रीय राजमार्ग लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट लिमिटेड (एनएचएलएमएल) के माध्यम से प्रस्तावित इस परियोजना के तहत कोल्लूर से कोडचाद्री तक लगभग 6.8 किलोमीटर लंबा रोपवे बनाया जाना है। परियोजना पूरी होने पर यह देश के सबसे लंबे रोपवे प्रोजेक्ट्स में शामिल होगी।
इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य श्रद्धालुओं और पर्यटकों को सुरक्षित, तेज और सुविधाजनक यात्रा उपलब्ध कराना है। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु और पर्यटक कोडचाद्री पहुंचते हैं, लेकिन पहाड़ी और दुर्गम सडक़ मार्ग के कारण यात्रा चुनौतीपूर्ण बनी रहती है। ऐसे में रोपवे को क्षेत्र के पर्यटन और धार्मिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा था।
हालांकि, परियोजना का बड़ा हिस्सा मूकांबिका वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में आता है, जिसके कारण लगभग 11.4 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग की आवश्यकता है। वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) नहीं मिलने के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ पा रही है।
दूसरी ओर, पर्यावरणविदों ने भी इस योजना का विरोध किया है। उनका कहना है कि पश्चिमी घाट की संवेदनशील पारिस्थितिकी व्यवस्था पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। रिपोर्टों के अनुसार, परियोजना के लिए 500 से अधिक पेड़ों की कटाई करनी पड़ सकती है, जिससे जैव विविधता को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।
पूर्व विधायक बी.एम. सुकुमार शेट्टी ने बताया कि वर्ष 2020 में सर्वेक्षण कार्य शुरू किया गया था और यूरोपीय देशों की तर्ज पर आधुनिक रोपवे विकसित करने की योजना बनाई गई है। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) केंद्र सरकार को सौंपी गई है। परियोजना पूरी होने पर कोल्लूर और कोडचाद्री क्षेत्र में पर्यटन को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
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