ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को बचाने के लिए 25 करोड़ रुपए की योजना का प्रस्ताव
जिन गांवों में पक्षी मौजूद वहीं ही स्कूलों में चलेंगे जागरुकता कार्यक्रम
हुब्बल्ली.
बल्लारी जिले के सिरुगुप्पा तालुक में पाए जाने वाले, विलुप्त होने के कगार पर स्थित ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (जीआईबी) पक्षियों के आवास (हेबिटेट) का विस्तार कर, अंडे एकत्र कर, उन्हें कृत्रिम रूप से चूजे निकलवाकर उन्हें पर्यावरण में छोड़ के लिए वन विभाग ने 25 करोड़ रुपए की व्यापक योजना तैयार कर राज्य सरकार को भेजी है।

बल्लारी वन विभाग के उप वन संरक्षण अधिकारी संदीप राव सूर्यवंशी ने बताया कि यह पांच साल की परियोजना है, केएमईआरसी (कर्नाटक खान पर्यावरण पुनर्वास योजना) के तहत धन की मांग की गई है। प्रस्ताव दस दिन पहले सरकार को भेजा गया था।

उपायों का अध्ययन करेंगे

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की संरक्षण के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया है। प्रो समद कोट्टूर, डॉ. अरुण, डॉ. मनोहर, सुतीर्थ दत्ता सदस्य हैं। जून या जुलाई में वन विभाग के अधिकारी और विशेषज्ञ समिति के सदस्य राजस्थान के जैसलमेर डेजर्ट नेशनल पार्क का दौरा कर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पक्षियों के संरक्षण के लिए किए गए उपायों का अध्ययन करेंगे।

अधिकारियों के लिए कार्यशाला : बल्लारी वन विभाग के उप वन संरक्षण अधिकारी संदीप राव सूर्यवंशी ने बताया कि ग्रेट इंडियन बस्टर के बारे में वन अधिकारियों के लिए बल्लारी में शीघ्र ही आधे दिन की कार्यशाला आयोजित करने का इरादा है, इसे सलीम अली इंस्टीट्यूट ऑफ बर्ड साइंस, कोयम्बटूर के तत्वावधान में आयोजित किया जाएगा। सिरुगुप्पा में जीआईबी पक्षी अभयारण्य में अधिकारियों का दौरा कार्यक्रम होगा। जिन 24 गांवों में ये पक्षी मौजूद हैं, वहां के 44 स्कूलों के बच्चों में जागरुकता पैदा करने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

सिरुगुप्पा में मात्र छह पक्षी, 12 जिलों में भी मौजूदगी
संदीप ने बताया कि सिरुगुप्पा तालुक के कई गांवों में ये पक्षी देखे गए हैं। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड बल्लारी, विजयनगर, कोप्पल, रायचूर, गदग, यादगीर, कलबुर्गी, बीदर और बेलगावी सहित कर्नाटक के 12 जिलों में मौजूद है। कर्नाटक, राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश और अन्य कुछ राज्यों में इसकी संख्या कुल मिलाकर 150 हो सकती है। सिरुगुप्पा में छह पक्षी हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी टांगें, लंबी गर्दन वाला यह बड़ा पक्षी हवाईजहाज की तरह थोड़ी दूरी दौड़ता है और रफ्तार पकडऩे के बाद आसमान में उड़ता है। इसकी सीधी नजर नहीं है। पार्श्व दृष्टि है। जमीनी स्तर पर उडऩे से बिजली के खंभे और तारों से टकराने का खतरा रहता है। जहां ये पक्षी मौजूद हैं, वहां बिजली के खंभे और तार लगाने से रोकने की कार्रवाई की जानी चाहिए।

एक हजार एकड़ भूमि की आवश्यकता

सूर्यवंशी ने स्पष्ट किया कि काली जमीन पर विचरण करने वाले और फसलों में कीड़े खाने वाले, घोसले बनाने वाले और अंडे देने वाले इन पक्षियों के लिए वन अधिकारी रहे ताकतसिंह राणावत ने एक निजी कारखाने की ओर से वैकल्पिक भूमि परियोजना के तहत 105 हेक्टेयर जमीन प्राप्त की है। फिर एक उद्योग ने 44 हेक्टेयर जमीन देने के लिए आगे आया है। जीआईबी पक्षी अभ्यारण्य बनाने के लिए सिरुगुप्पा में कम से कम एक हजार एकड़ भूमि की आवश्यकता है।

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By Bharat Ki Awaz

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