खामोशी से नेतृत्व तक: बीड़ी मजदूर महिलाओं की आवाज बनीं जबीना खानमजबीना खानम।

दावणगेरे की महिला कार्यकर्ता ने संगठन, अधिकार और आत्मविश्वास के दम पर बदली सैकड़ों मजदूर महिलाओं की जिंदगी

दावणगेरे. दावणगेरे की बीड़ी मजदूर महिलाओं के संघर्ष की कहानी में जबीना खानम का नाम बदलाव की एक मजबूत पहचान बनकर उभरा है। वर्ष 2014 में सहायक श्रम आयुक्त कार्यालय में वेतन वृद्धि को लेकर हुई बैठक के दौरान जब महिलाओं की आवाज दबाने की कोशिश हुई, तब पहली बार उन्होंने खुलकर अपने अधिकारों की बात रखी। यही क्षण उनके संगठित आंदोलन की नई शुरुआत साबित हुआ।

संघर्ष से बना नेतृत्व

ऑटो रिक्शा चालक मोहम्मद गौस खान और बीड़ी मजदूर जैनब्बी की बेटी जबीना का सपना शिक्षिका बनने का था। आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई बीच में छूट गई और परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें बीड़ी मजदूरों के बीच ला खड़ा किया। यहीं उन्होंने महसूस किया कि महिलाओं की वास्तविक समस्या केवल कम मजदूरी नहीं, बल्कि अधिकारों के प्रति जागरूकता और आत्मविश्वास की कमी भी है।

महिला साहित्य से प्रेरित होकर उन्होंने स्वयं सहायता समूह बनाए, महिलाओं के राशन कार्ड, आधार और अन्य सरकारी दस्तावेज बनवाने में मदद की। इससे महिलाओं का प्रशासन पर भरोसा बढ़ा और वे अपने अधिकारों के लिए आगे आने लगीं।

संगठन ने बदली तस्वीर

वर्ष 2014 में नेरलु बीड़ी मजदूर संघ की स्थापना हुई और 2017 में इसे श्रम विभाग में पंजीकृत कराया गया। वर्ष 2016 में ठेकेदारों ने संगठन तोडऩे की कोशिश की, लेकिन महिलाओं की एकजुटता ने इस प्रयास को विफल कर दिया। इसके बाद मजदूरी में कुछ सुधार हुआ और सबसे बड़ा बदलाव महिलाओं के आत्मविश्वास में देखने को मिला।

आगे चलकर 2020 में मुस्लिम महिला महासंघ और बाद में दलित-मुस्लिम महिला महासंघ का गठन हुआ। हजारों महिलाओं ने इन संगठनों से जुडक़र अपने अधिकारों के लिए संगठित आवाज बुलंद की। दिल्ली के शाहीन बाग आंदोलन के दौरान दावणगेरे में 49 दिनों तक चला महिला आंदोलन भी इसी जागरूकता का प्रतीक बना।

आज जबीना खानम कहती हैं कि अब आंदोलन किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है। कई नई महिला नेता तैयार हो चुकी हैं, जो श्रमिक अधिकारों से लेकर सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर भी मुखर होकर सवाल उठा रही हैं। यह बदलाव बताता है कि बीड़ी मजदूर महिलाओं की लड़ाई अब केवल मजदूरी तक सीमित नहीं, बल्कि सम्मान, अधिकार और समान भागीदारी की व्यापक लड़ाई बन चुकी है।

 

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By Bharat Ki Awaz

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