लोकतंत्र की मजबूती और शिक्षा की गुणवत्ता दोनों जरूरी
बार-बार शिक्षकों पर डाला जा रहा प्रशासनिक जिम्मेदारियों का बोझ
हुब्बल्ली. भारत में जब भी कोई बड़ा प्रशासनिक अभियान शुरू होता है-चाहे जनगणना हो, चुनाव हो, मतदाता सूची का पुनरीक्षण हो या कोई सरकारी सर्वेक्षण-सबसे पहले शिक्षकों की सेवाएं ली जाती हैं। जिन हाथों में बच्चों की किताबें और ब्लैकबोर्ड होना चाहिए, वे कुछ ही दिनों में मतदाता सूची, सरकारी प्रपत्र और सर्वेक्षण रजिस्टर संभालते नजर आते हैं। प्रश्न चुनाव की महत्ता का नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं का है।
विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए एक बार फिर शिक्षकों की तैनाती ने इस बहस को जीवंत कर दिया है। लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष चुनाव और त्रुटिरहित मतदाता सूची अनिवार्य हैं, लेकिन क्या इसकी कीमत बच्चों की पढ़ाई से चुकाई जानी चाहिए?
सबसे बड़ा नुकसान किसका?
इसका सबसे अधिक असर सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों पर पड़ता है। निजी विद्यालयों में यदि किसी शिक्षक को लंबे समय के लिए प्रशासनिक कार्य में लगाया जाए तो प्रबंधन वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था कर देता है। इसके विपरीत, अनेक सरकारी विद्यालय ऐसे हैं जहां केवल एक या दो शिक्षक ही पूरे स्कूल की जिम्मेदारी संभालते हैं। ऐसे में एक शिक्षक के भी बाहर जाने का अर्थ है कई दिनों तक कक्षाएं प्रभावित होना और सैकड़ों विद्यार्थियों का पढ़ाई से वंचित रह जाना।
यह स्थिति शिक्षा के अधिकार और समान अवसर के सिद्धांत पर भी प्रश्न खड़े करती है। इसका सबसे अधिक नुकसान आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के उन बच्चों को होता है, जिनके लिए सरकारी विद्यालय ही शिक्षा का एकमात्र माध्यम हैं।
बदली हैं परिस्थितियां
स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में शिक्षकों को प्रशासनिक कार्यों में लगाना व्यावहारिक आवश्यकता थी। उस समय प्रशिक्षित सरकारी कर्मचारियों की संख्या सीमित थी और शिक्षित वर्ग में शिक्षक प्रमुख थे। लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। सरकारी विभागों का विस्तार हुआ है, स्थानीय निकाय अधिक सक्षम हुए हैं, डिजिटल रिकॉर्ड और डेटा प्रबंधन प्रणाली विकसित हो चुकी है तथा संविदा आधारित प्रशासनिक कर्मियों की नियुक्ति जैसे विकल्प भी उपलब्ध हैं।
ऐसे में दशकों पुरानी व्यवस्था की समीक्षा करना समय की मांग है।
समय का सम्मान ही शिक्षक का सम्मान
सरकारें शिक्षा की गुणवत्ता, बुनियादी साक्षरता, गणितीय दक्षता और सीखने के स्तर में सुधार की बात करती हैं। लेकिन यदि उन्हीं शिक्षकों को बार-बार कक्षाओं से बाहर बुलाया जाएगा, तो इन लक्ष्यों को हासिल करना कठिन होगा। शिक्षक का सबसे बड़ा दायित्व बच्चों को पढ़ाना है, न कि लगातार प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहना।
यह चुनाव या जनगणना का विरोध नहीं है। ये लोकतंत्र और सुशासन की अनिवार्य प्रक्रियाएं हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इनके लिए अलग प्रशासनिक तंत्र, अस्थायी नियुक्तियां, स्थानीय स्वशासी संस्थाओं की भागीदारी और तकनीक का अधिक प्रभावी उपयोग किया जाए।
लोकतंत्र को शुद्ध मतदाता सूची चाहिए, लेकिन उतनी ही आवश्यकता उन कक्षाओं की भी है, जहां देश के भावी नागरिक तैयार हो रहे हैं। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना ही सुशासन की वास्तविक कसौटी है।
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