13 वर्षों से विवादों में सिफारिशें
6 राज्यों का 56,825 वर्ग किमी क्षेत्र प्रभावित
हुब्बल्ली। पश्चिमी घाट केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की जीवनरेखा है। यहां से निकलने वाली नदियां-गोदावरी, कृष्णा और कावेरी पूरे क्षेत्र की जल सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था का आधार हैं। यही कारण है कि कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट पिछले 13 वर्षों से लगातार विवादों और चर्चाओं के केंद्र में बनी हुई है।
रिपोर्ट का मूल उद्देश्य और सिफारिशें
वर्ष 2013 में प्रस्तुत कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट के 37 प्रतिशत क्षेत्र (लगभग 60,000 वर्ग किलोमीटर) को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (इएसए) घोषित करने की सिफारिश की थी। इसका मुख्य उद्देश्य खनन, भारी उद्योग और बड़े पैमाने पर होने वाले निर्माण जैसी विनाशकारी गतिविधियों पर पूर्ण रोक लगाना था। इसके साथ ही सतत कृषि, पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन और स्थानीय समुदायों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं को प्रोत्साहित करने की बात कही गई थी। समिति ने स्पष्ट किया था कि इसका उद्देश्य जनजीवन को प्रभावित करना नहीं, बल्कि प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना है।
ग्रामीणों में बेदखली और भविष्य का भय
सिफारिशों के बावजूद, कर्नाटक के 10 जिलों के 1,449 गांवों में भारी भय और अनिश्चितता का माहौल है। ग्रामीणों को आशंका है कि इएसए लागू होने से उनके मकान, खेत, सडक़ें, स्कूल और अस्पतालों का विकास कार्य बुरी तरह प्रभावित होगा। अपनी जमीन खोने और बच्चों के भविष्य को लेकर ग्रामीण लगातार सवाल उठा रहे हैं।
गाडगिल बनाम कस्तूरीरंगन रिपोर्ट
इससे पूर्व, गाडगिल समिति ने पश्चिमी घाट के 64 प्रतिशत क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करने का सुझाव दिया था, जिसका देशव्यापी विरोध हुआ। तत्पश्चात कस्तूरीरंगन समिति का गठन किया गया, जिसने वैज्ञानिक उपग्रह डेटा के आधार पर संवेदनशील क्षेत्र का दायरा घटाकर 37 प्रतिशत कर दिया। यही भौगोलिक अंतर आज भी केंद्र और राज्यों के बीच बहस का मुख्य विषय बना हुआ है।
सरकार का रुख और कर्नाटक का विरोध
केंद्र सरकार ने जुलाई 2026 में सातवीं बार मसौदा अधिसूचना (ड्राफ्ट नोटिफिकेशन) जारी की है, जिसमें छह राज्यों—गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के 56,825 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को इएसए में शामिल करने का प्रस्ताव है। कर्नाटक सरकार ने इस अधिसूचना का कड़ा विरोध किया है। राज्य सरकार का कहना है कि यदि आवश्यक हुआ तो विधानमंडल का विशेष सत्र बुलाकर केंद्र को इस संबंध में औपचारिक प्रस्ताव भेजा जाएगा। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने स्पष्ट किया है कि राज्य के लोगों और किसानों के हितों की हर कीमत पर रक्षा की जाएगी।
संरक्षण की अनिवार्य आवश्यकता
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिमी घाट का विनाश केवल जंगलों और वन्यजीवों का नुकसान नहीं है, बल्कि जल स्रोतों के सूखने, भीषण भूस्खलन, बाढ़ और कृषि संकट जैसी प्राकृतिक आपदाओं का कारण बन सकता है। यहां का पारिस्थितिक संतुलन और वर्षा का चक्र सीधे तौर पर कर्नाटक के बायलुसीमे (शुष्क) क्षेत्र के किसानों की आजीविका से जुड़ा हुआ है।
विकास और पर्यावरण में संतुलन की चुनौती
समूचे विवाद का मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि हमें विकास चाहिए या पर्यावरण संरक्षण, बल्कि विचारणीय विषय यह है कि विकास किस प्रकार का, कहां और कितनी मात्रा में हो। एक छोटे किसान की पारंपारिक खेती और एक बड़े वाणिज्यिक खनन उद्योग को एक ही मापदंड पर नहीं मापा जा सकता। पर्यावरण संरक्षण और आम जनता की आजीविका के बीच यही न्यायपूर्ण संतुलन खोजना आज की सबसे बड़ी चुनौती है।
Breaking News सबसे पहले पाना चाहते हैं?
अभी हमारे WhatsApp Channel को join करें
हर खबर सबसे पहले
Join करें : https://whatsapp.com/channel/0029Vb7S2RA65yD9fZX4Og1Z

