जैन रचनाकारों ने साहित्य के साथ अहिंसा और आध्यात्मिक मूल्यों को भी किया समृद्ध
हुब्बल्ली। कर्नाटक विश्वविद्यालय धारवाड़ के जैनशास्त्र अध्ययन पीठ, जेएसएस डॉ. डी. वीरेंद्र हेग्गड़े अनुसंधान केंद्र और छब्बी जैन समाज के संयुक्त तत्वावधान में साहित्य-संस्कृति विषय पर विशेष व्याख्यान हुआ। कार्यक्रम बालाचार्य डॉ. सिद्धसेन मुनि के सान्निध्य में आयोजित किया गया।
विजयपुर महिला विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभागाध्यक्ष डॉ. ओमकार काकड़े ने कहा कि करीब दो हजार वर्ष पुरानी कन्नड़ भाषा और प्रदेश की संस्कृति के विकास में जैन कवियों का योगदान अपार है। पंपा, रन्ना, पोन्ना, नागचंद्र, जन्ना और नयसेन जैसे रचनाकारों ने कन्नड़ साहित्य को समृद्ध करने के साथ अहिंसा, समानता, धार्मिक चिंतन और आध्यात्मिक मूल्यों को समाज तक पहुंचाया।
मुख्य वक्ता सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. वाइ.एम. भजंत्री ने हलगन्नड़ (प्राचीन कन्नड़) साहित्य में जैन कवियों का योगदान’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि जैन कवियों की रचनाओं के बिना कन्नड़ साहित्य की कल्पना अधूरी है। उनके साहित्यिक योगदान ने कन्नड़ भाषा को मजबूती दी और शास्त्रीय भाषा के दर्जे की राह प्रशस्त करने में योगदान दिया।
जैनशास्त्र अध्ययन पीठ के संयोजक डॉ. जिनदत्त हडग़ली ने पीठ की गतिविधियों एवं भावी योजनाओं की जानकारी दी। बालाचार्य डॉ. सिद्धसेन मुनि ने पीठ के प्रयासों की सराहना की।
कार्यक्रम में सोमदेव बय्याजी, राजेंद्र बय्याजी, शांतिराज मल्लसमुद्र, धनपाल मुन्नोळी, शांतिनाथ होतपेठी, अनंत कलघटगी, रवि हुल्लंबी सहित श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित थे।
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