‘नक्सल मुक्त’ कर्नाटक में शरणागतों का पुनर्वास अधर में, जेलों में कट रही जिंदगी
आठ नक्सलियों के मुकदमे तीन महीने में वापस लेने का दिया था भरोसा
केरल की जेल में बंद रवींद्र की हालत गंभीर, तत्काल हस्तक्षेप की मांग
हुब्बल्ली। हथियार छोडक़र मुख्यधारा में लौटे, लेकिन राहत नहीं मिली। आत्मसमर्पण के समय किए गए वादों के बावजूद मुकदमों की वापसी और पुनर्वास की प्रक्रिया अधर में होने का आरोप लगाते हुए शांति के लिए नागरिक मंच ने कर्नाटक सरकार को कठघरे में खड़ा किया है।
मंच का कहना है कि राज्य को नक्सल मुक्त घोषित करने के बाद सरकार ने उन लोगों की सुध नहीं ली, जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोडक़र वापसी का फैसला किया था। उधर, केरल की त्रिशूर जेल में बंद कर्नाटक के नक्सली कोट्टेहोले रवि उर्फ रवींद्र की हालत गंभीर होने का दावा करते हुए मंच ने तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
मंच के प्रो. नागरगेरे रमेश और प्रो. वी.एस. श्रीधर के अनुसार, जनवरी 2025 में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने वाले रवींद्र समेत आठ नक्ससियों के खिलाफ दर्ज मामले तीन महीने के भीतर वापस लेने और पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी करने का भरोसा दिया गया था। लेकिन तय समय बीतने के बाद भी उन्हें कानूनी मामलों से राहत नहीं मिली। मंच ने आरोप लगाया कि सरकार की घोषणा और जमीनी कार्रवाई के बीच बड़ा अंतर है।
भूख हड़ताल के बाद अस्पताल में भर्ती
मंच के मुताबिक, त्रिशूर की उच्च सुरक्षा जेल में बंद रवींद्र ने कथित तौर पर सरकारी उदासीनता से निराश होकर भूख हड़ताल शुरू की। तबीयत बिगडऩे पर उन्हें त्रिशूर मेडिकल कॉलेज अस्पताल की गहन चिकित्सा इकाई में भर्ती कराया गया। मंच ने उनकी हालत को लेकर चिंता जताते हुए उन्हें तत्काल कर्नाटक स्थानांतरित करने और उचित चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित करने की मांग की है।
चार लोग अब भी केरल की जेलों में
मंच का दावा है कि केरल में लंबित मामलों के चलते चार लोग अब भी जेलों में बंद हैं। रवींद्र के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है। ऐसे में मुकदमों की वापसी की मांग के साथ कानूनी प्रक्रिया और आरोपितों की न्यायिक स्थिति का सवाल भी अहम है।
घोषणा के बाद अब जवाबदेही का सवाल
मंच ने याद दिलाया कि मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या, वरिष्ठ मंत्रियों और अधिकारियों की मौजूदगी में आत्मसमर्पण करने वालों का स्वागत किया गया था। सरकार ने इसे राज्य में नक्सल गतिविधियों के खात्मे की दिशा में बड़ी उपलब्धि बताया था। मंच का कहना है कि आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास, रोजगार और कानूनी सहायता जैसे मुद्दों पर ठोस कार्रवाई जरूरी थी।
आत्मसमर्पण करने वालों में अधिकांश के आदिवासी समुदाय से जुड़े होने का उल्लेख करते हुए मंच ने कहा कि उनकी समस्याओं में मूलभूत सुविधाओं और कृषि भूमि पर अधिकार जैसे सवाल भी शामिल रहे हैं। अब मांग है कि सरकार लंबित मामलों की समीक्षा करे, पुनर्वास की स्थिति स्पष्ट करे और जेल में बंद लोगों के स्वास्थ्य व कानूनी अधिकारों को लेकर तत्काल कदम उठाए।
नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा के बाद अब सरकार के सामने चुनौती है कि आत्मसमर्पण करने वालों से किए गए वादों पर कितनी और कब तक कार्रवाई होती है।
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