कर्नाटक में न्याय की सुस्त रफ्तार
463 मामले अदालतों में लंबित, 70 में आरोपी बरी
हुब्बल्ली। कर्नाटक में दहेज प्रताडऩा से जुड़ी मौतों के मामलों में दोष सिद्धि की दर बेहद कम है। जनवरी 2022 से जुलाई 2026 के बीच राज्य में दहेज मृत्यु के 629 मामले दर्ज हुए, लेकिन अब तक केवल सात मामलों में आरोपियों को सजा सुनाई गई। वहीं, 70 मामलों में आरोपी बरी हो चुके हैं। गृह विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पुलिस ने 543 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए, जिनमें से 463 अदालतों में लंबित हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, सजा और बरी होने सहित निपटाए गए 77 मामले वर्ष 2022 से 2024 के बीच दर्ज हुए थे। वर्ष 2024 में नौ मामलों में आरोपी बरी हुए, जबकि पिछले तीन वर्षों में किसी मामले में सजा नहीं सुनाई गई।
दहेज प्रताडऩा के 8,307 मामले लंबित
इसी अवधि में राज्य में दहेज प्रताडऩा के 13,453 मामले दर्ज किए गए। पुलिस ने 10,649 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए, लेकिन 8,307 मामले अब भी अदालतों में लंबित हैं। इन मामलों में केवल 50 में सजा हुई, जबकि 1,914 मामलों में आरोपी बरी हुए।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में दहेज मृत्यु के औसतन 126 मामले प्रति वर्ष दर्ज किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि घरों के भीतर होने वाली प्रताडऩा के मामलों में स्वतंत्र गवाहों की कमी जांच और दोष सिद्धि को चुनौतीपूर्ण बनाती है।
हिंसा सहने को मजबूर महिलाएं
बेंगलूरु स्थित अवेक्षा महिला ट्रस्ट की संस्थापक डोना फर्नांडिस का कहना है कि सरकारी आंकड़े समस्या की पूरी तस्वीर नहीं दिखाते। लंबी और कठिन न्यायिक प्रक्रिया के कारण कई महिलाएं शिकायत दर्ज कराने से भी हिचकती हैं। उन्होंने चिंता जताई कि अनेक महिलाएं बाहर निकलने का रास्ता न मिलने पर शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हिंसा सहती रहती हैं।
उन्होंने बताया कि दहेज प्रताडऩा पर अंकुश लगाने के लिए प्रभावी जांच, समयबद्ध सुनवाई और पीडि़त महिलाओं को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है।
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