उचित भाव के इंतजार में खेतों में खड़ी पककर तैयार फसल
देरी से वजन घटने और किसानों का नुकसान बढऩे का खतरा
बेलगावी। गन्ने का भाव तय करने में भले कुछ और दिन लग सकते हैं, लेकिन खेत में पककर तैयार फसल पानी के अभाव में इंतजार नहीं कर सकती। कर्नाटक में गन्ना किसानों के सामने अब दोहरी मार है—एक ओर उचित भाव के लिए आंदोलन, दूसरी ओर कटाई में देरी से फसल का वजन और गुणवत्ता घटने का खतरा। सवाल यह है कि भाव तय होने में देरी का नुकसान किसान क्यों उठाए।
भारतीय चीनी एवं जैव-ऊर्जा उत्पादक संघ (इस्मा) के प्रारंभिक अनुमान के अनुसार, 2026-27 में राज्य में गन्ने का रकबा करीब 6.31 लाख हेक्टेयर रहने का अनुमान है, जो पिछले सत्र के 6.80 लाख हेक्टेयर से करीब 7.2 प्रतिशत कम है। राज्य में 81 चीनी मिलें हैं, इनमें 29 अकेले बेलगावी जिले में हैं।
भाव बढ़े, फिर भी भरपाई मुश्किल
गन्ने से किसान की आय केवल प्रति टन भाव पर नहीं, बल्कि मिल तक पहुंचने वाले वास्तविक वजन पर भी निर्भर करती है। पानी की कमी से प्रभावित खेतों में कटाई टलने पर वजन घट सकता है। ऐसे में बाद में घोषित ऊंचा भाव भी घटे वजन से हुए नुकसान की पूरी भरपाई न कर पाए, यह चिंता किसानों की है।
विजयपुर, मंड्या और मैसूरु में बारिश की कमी तथा बेलगावी में असमान वर्षा ने स्थिति को और जटिल किया है। एक ही जिले में भी फसल की परिपक्वता और सिंचाई की उपलब्धता अलग-अलग है। इसलिए सभी क्षेत्रों में एक जैसी कटाई व्यवस्था किसानों के लिए कारगर नहीं होगी।
मिलें खुलना ही पर्याप्त नहीं
पेराई शुरू होने के बावजूद हर खेत की तत्काल कटाई सुनिश्चित नहीं होती। कटाई दल, परिवहन साधन, मिलों की क्षमता और आपूर्ति क्रम के कारण किसानों को इंतजार करना पड़ सकता है। ऐसे में मिलों को पेराई शुरू करने के साथ किसानों को कटाई और परिवहन का स्पष्ट कार्यक्रम भी देना चाहिए।
किसानों की मांग है कि उचित भाव पर जल्द निर्णय के साथ संकटग्रस्त खेतों की प्राथमिकता से कटाई कराई जाए। अंतरिम व्यवस्था में गन्ना खरीदा जाए तो अंतिम भाव घोषित होने पर अंतर की राशि चुकाने की लिखित गारंटी दी जाए।
खेत में नुकसान तो जवाबदेही भी तय हो
प्रशासन, कृषि विभाग और चीनी मिलों को पानी की कमी से प्रभावित खेतों का संयुक्त निरीक्षण कर नुकसान का आकलन करना चाहिए। कटाई, परिवहन, खरीद और भुगतान की शर्तें भी स्पष्ट होनी चाहिए।
किसानों की लड़ाई केवल अधिक भाव की नहीं, बल्कि तैयार फसल का वास्तविक मूल्य बचाने की भी है। इसलिए भाव तय करने की समयसीमा के साथ संकटग्रस्त गन्ने की कटाई की कार्ययोजना भी जरूरी है। भाव तय होने तक खेत में सूखकर वजन घटा गन्ना किसान के लिए सिर्फ फसल नहीं, सीधे आर्थिक नुकसान में बदल जाएगा—इस नुकसान की जिम्मेदारी कौन उठाएगा।
Breaking News सबसे पहले पाना चाहते हैं?
अभी हमारे WhatsApp Channel को join करें
हर खबर सबसे पहले
Join करें : https://whatsapp.com/channel/0029Vb7S2RA65yD9fZX4Og1Z

