मजबूरी में सीखी टोकरी-चटाई बनाने की कला को बनाया कारोबार
300 से अधिक लोगों को प्रशिक्षण, 10 महिलाओं को रोजगार
हुब्बल्ली। गरीबी ने पढ़ाई का रास्ता रोक दिया, लेकिन सीखने की ललक नहीं रोक सकी। कलघटगी तालुक के गलगी हुलकोप्पा गांव के फकीरप्पा चन्नप्पा मेदार ने मजबूरी में सीखे बांस के हुनर को अपनी पहचान और रोजगार का माध्यम बना लिया। कभी गांव-गांव घूमकर बांस की टोकरियां और चटाइयां बेचने वाले फकीरप्पा आज बांस से करीब 40 तरह के उपयोगी और सजावटी उत्पाद तैयार कर रहे हैं। इतना ही नहीं, वे 300 से अधिक लोगों को प्रशिक्षण देकर उनमें से करीब 70 प्रतिशत को स्वरोजगार से जोड़ चुके हैं।
फकीरप्पा का बचपन आर्थिक तंगी में बीता। पिता खेती और मां मजदूरी करती थीं। स्कूल के साथ मवेशी चराना और घास लाना भी उनकी जिम्मेदारी थी। आर्थिक स्थिति के कारण पीयूसी के बाद पढ़ाई आगे नहीं बढ़ सकी। खेती में हाथ बंटाने की पारिवारिक अपेक्षा के बीच वे कुछ अलग करना चाहते थे। इसी तलाश में वे मुंडगोड अपनी बुआ के घर चले गए, जहां मेदार समुदाय के लोगों से बांस की टोकरी और चटाई बनाने का हुनर सीखा।

इसके बाद मलगी गांव की विकास ग्रामीण संस्था के प्रशिक्षण शिविर ने उनके हुनर को नई दिशा दी। मणिपुर की संतानी और हस्तशिल्प प्रशिक्षण संस्थान के निरंजन से प्रशिक्षण लेकर उन्होंने बांस से सजावटी और उपयोगी वस्तुएं बनाना सीखा। आगे कुंदापुर में प्रशिक्षण लिया और स्वयं प्रशिक्षक बन गए।
300 से अधिक लोगों को प्रशिक्षण
फकीरप्पा ने सात साल तक प्रशिक्षक के रूप में काम किया और 300 से अधिक लोगों को बांस उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया। इनमें करीब 70 प्रतिशत लोग आज स्वरोजगार कर रहे हैं। इसके बाद हल्याल के रुडसेट में पांच साल तक प्रशिक्षण दिया। गुजरात के राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान केंद्र, बेंगलूरु के हस्तशिल्प विकास निगम तथा अन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों से उन्होंने अपना कौशल निखारा। उनके काम को उत्कृष्ट स्टॉल और नवोद्यमी पुरस्कार भी मिले।

दस महिलाओं को रोजगार से जोड़ा
अपने गांव लौटकर उन्होंने बांस की सजावटी वस्तुओं का काम शुरू किया। वर्ष 2010 में 10 महिलाओं को जोडक़र श्री केतेश्वर स्वयं सहायता समूह बनाया। महिलाओं को बांस उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। आज महिलाएं अपनी सुविधा के अनुसार बांस घर ले जाकर उत्पाद तैयार करती हैं और काम के अनुसार पारिश्रमिक पाती हैं। इससे उन्हें घर बैठे आय का साधन मिला है।
40 तरह के उत्पाद, 700 रुपए तक कीमत
प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल से पारंपरिक बांस की टोकरियों और चटाइयों की मांग घटने लगी तो फकीरप्पा ने डिजाइन और उपयोग में बदलाव किया। समूह अब पेन स्टैंड, हैंगिंग लैंप, की-चेन, की-होल्डर, टी-ट्रे, बेड लैंप, लैंप शेड, वॉल पीस, फूलदान, फोटो फ्रेम, फल रखने की टोकरी और आकाश कंदील समेत करीब 40 तरह के उत्पाद बनाता है। इनकी कीमत 20 से 700 रुपए तक है। मुंबई, दिल्ली और बेंगलूरु समेत कई शहरों में इनके उत्पाद पहुंच रहे हैं। केरल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, गोवा और दिल्ली में भी इनकी मांग है।

बांस की उपलब्धता बड़ी चुनौती
इस कारोबार में कच्चे माल की उपलब्धता सबसे बड़ी चुनौती है। वन विभाग से अनुमति लेकर बांस खरीदने पर एक बांस करीब 50 रुपए में मिलता है, जबकि बिचौलियों से यही कीमत 200 रुपए तक पहुंच जाती है। ताजा कटा या एक-दो दिन पुराना बांस ही आसानी से आकार लेता है। बाद में नमी कम होने से वह कठोर हो जाता है।
फकीरप्पा कहते हैं कि बांस को समय रहते आकार देना पड़ता है। जिंदगी भी ऐसी ही है। इंसान को सही समय पर खुद को गढ़ लेना चाहिए। एक बार कठोर हो जाने पर बदलाव आसान नहीं होता।
बांस काटने के लिए मशीन का इस्तेमाल होता है, लेकिन इसके बाद की पूरी प्रक्रिया हाथों से की जाती है। छोटी-सी की-चेन तैयार करने में भी एक से दो घंटे लग जाते हैं। प्राकृतिक रूप बनाए रखते हुए रंगाई और बुनाई की जाती है। यही हस्तकौशल इन उत्पादों को अलग पहचान देता है।
आज पर्यावरण अनुकूल और प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर प्राकृतिक उत्पादों की मांग बढ़ रही है। फकीरप्पा इसी बदलती पसंद को अवसर में बदल रहे हैं। गरीबी ने उनकी औपचारिक शिक्षा भले रोक दी, लेकिन हुनर सीखने और दूसरों को सिखाने का रास्ता खोल दिया। बांस के तिनकों से रोजगार बुनने वाली उनकी कहानी बताती है कि सही सोच, मेहनत और कौशल से गांव में भी सफल उद्यम खड़ा किया जा सकता है।
प्रमुख तथ्य
-प्रशिक्षित लोग : 300 से अधिक
– प्रशिक्षण के बाद स्वरोजगार : करीब 70 प्रतिशत
– समूह से जुड़ी महिलाएं : 10
– उत्पादों की किस्में : करीब 40
– उत्पादों की कीमत : 20 से 700 रुपए
– स्वयं सहायता समूह की स्थापना : 2010
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