कस्तूरीरंगन की जद में पूरा गांव, 12 साल से दहशतबेल्वे ग्राम पंचायत कार्यालय।

केवल 29 प्रतिशत वन क्षेत्र वाले बेल्वे को पर्यावरण संवेदनशील सूची में शामिल करने पर ग्रामीणों में रोष

सिद्धापुर (उत्तर कन्नड़)। पश्चिमी घाट से सटे बेल्वे गांव के हजारों परिवार पिछले 12 वर्षों से एक ही चिंता से जूझ रहे हैं—पूरा गांव कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के दायरे में क्यों है? करीब 29 प्रतिशत भू-भाग पर वन क्षेत्र होने के बावजूद पूरे गांव को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र की सूची में शामिल किए जाने से ग्रामीणों में विकास और आजीविका को लेकर आशंका बनी हुई है।

करीब 3,855.95 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले बेल्वे में लगभग 906.8 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। गांव में करीब 2,037 परिवार और अनुमानित 12 हजार की आबादी है। यहां 246 व्यापारिक एवं औद्योगिक इकाइयों के अलावा 18 कारखाने भी संचालित हैं। कृषि और उद्योग स्थानीय लोगों की आजीविका के प्रमुख आधार हैं।

29 प्रतिशत वन, फिर भी सूची में शामिल

ग्रामीणों का कहना है कि केंद्र सरकार के निर्धारित मानदंडों के अनुसार 50 प्रतिशत से कम वन क्षेत्र वाले गांव को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। इसके बावजूद बेल्वे को कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के दायरे में रखा गया है। वर्ष 2020 में अधिसूचना जारी होने के बावजूद ग्राम पंचायत को इसकी जानकारी नहीं मिली और वह समय पर आपत्ति दर्ज नहीं करा सकी।

ग्रामीणों के अनुसार तेंकहोल अभयारण्य की सीमा बेल्वे से लगी होने के कारण पूरे गांव को रिपोर्ट में शामिल किया गया है।

12 साल से जारी है असमंजस

कस्तूरीरंगन रिपोर्ट लागू करने को लेकर वर्ष 2012 में नोटिस मिलने के बाद ग्रामीणों ने सर्वे कराकर सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी। ग्राम पंचायत के प्रस्तावों और ग्रामीणों की आपत्तियों पर भी अपेक्षित विचार नहीं होने का आरोप है।

सर्गोली के एस. चंद्रशेखर शेट्टी का कहना है कि 50 प्रतिशत से कम वन क्षेत्र वाले गांव को रिपोर्ट से बाहर रखने के केंद्र सरकार के निर्देश के बावजूद बेल्वे को शामिल करना उचित नहीं है। पूरे गांव का वैज्ञानिक तरीके से दोबारा सर्वे कराया जाना चाहिए।

उद्यमी बी. सतीश किणी के अनुसार कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के मानदंडों के अनुसार बेल्वे इसके दायरे में नहीं आता। विशेष ग्रामसभा बुलाकर सरकार को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया जाएगा।

पहले हटाया, फिर दोबारा जोड़ा

कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के आधार पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने अप्रेल 2013 में जारी आदेश में बेल्वे को सूची से बाहर रखा था। लेकिन करीब सात महीने बाद जारी आदेश में गांव को फिर शामिल कर लिया गया। इस विरोधाभास ने ग्रामीणों की चिंता और बढ़ा दी।

धर्म और पर्यटन की भी पहचान

बेल्वे केवल कृषि और उद्योग के लिए ही नहीं, धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां बेल्वे शंकरनारायण क्षेत्र, यलंतूर दुर्गापरमेश्वरी मंदिर, कोंजाडी दुर्गापरमेश्वरी मंदिर, चित्तेरी दुर्गापरमेश्वरी मंदिर और केर्जाडी जलदुर्गा परमेश्वरी मंदिर समेत प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। ब्रह्मबैदर्कला गरुडी और संत जोसेफ चर्च भी क्षेत्र की पहचान हैं।

ग्रामीणों की मांग साफ है—पर्यावरण संरक्षण जरूरी है, लेकिन वैज्ञानिक सर्वे के आधार पर ही सीमा तय हो और वर्षों से जारी भ्रम का स्थायी समाधान किया जाए।

 

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By Bharat Ki Awaz

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