वेनलॉक अस्पताल के बाहर हर शाम लगती है 250 से ज्यादा जरूरतमंदों की कतार
कारुण्य नौ साल से मरीजों के तीमारदारों की मिटा रहा भूख का दर्द
मेंगलूरु। शाम के ठीक 5.20 बजे थे। किसी के हाथ में स्टील की छोटी प्लेट थी, तो कोई डिब्बा या प्लास्टिक की थाली थामे खड़ा था। महिलाएं, पुरुष और बच्चे बार-बार गर्दन उठाकर सडक़ की ओर देख रहे थे। जैसे ही पिकअप वाहन नजर आया, सडक़ किनारे सीढिय़ों और चबूतरे पर बैठे लोग तेजी से उठे और कतार में शामिल हो गए।
यह दृश्य था मेंगलूरु के वेनलॉक सरकारी जिला अस्पताल के पीछे का। थोड़ी ही देर में कतार 250 से ज्यादा लोगों की हो गई।
कुछ ही पलों बाद वाहन पर लिखा संदेश साफ नजर आया कारुण्य भूखों के लिए भोजन। एक-एक कर लोग आगे बढ़े। किसी की थाली में तीन चपातियां रखी गईं तो किसी के डिब्बे में सब्जी भरी गई। भोजन मिलते ही वे तेजी से वार्ड की ओर लौटने लगे। उनके लिए यह सिर्फ शाम का खाना नहीं, बल्कि अस्पताल के भारी खर्च के बीच एक बड़ी राहत थी।
दावणगेरे की बेबीबाई भी इसी कतार में थीं। उनके बड़े बेटे को किडनी की बीमारी है और इलाज के लिए उसे वेनलॉक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। छोटा बेटा भी उनके साथ है। डिब्बे में खाना भरवाने के बाद वह कतार के खत्म होने का इंतजार करती रहीं। वाहन रवाना होने ही वाला था कि वह झिझकते हुए आगे आईं और एक और चपाती के लिए हाथ बढ़ा दिया। आंखों में आंसू थे।
उन्होंने कहा कि बेटे के इलाज में पहले ही कर्ज में डूब गई हूं। बच्चों को पेटभर खाना तक नहीं खिला पाने की स्थिति आ गई थी।
अस्पताल का खर्च, ऊपर से खाने की चिंता
वेनलॉक में दक्षिण कन्नड़ के अलावा उडुपी, चिक्कमगलूरु, शिवमोग्गा, कोडगु, उत्तर कन्नड़ और हावेरी समेत कई जिलों से मरीज पहुंचते हैं। गंभीर और लंबे इलाज वाले मरीजों के तीमारदार कई-कई दिन अस्पताल में रहते हैं। मरीजों को अस्पताल से भोजन मिल जाता है, लेकिन उनके साथ रहने वालों के खाने का खर्च परिवार को उठाना पड़ता है। यहीं कारुण्य उनके लिए सहारा बनता है।
शिवमोग्गा के मजदूर रविकुमार कहते हैं कि कारुण्य से भोजन मिल जाता है, इसलिए कम से कम पेट की चिंता नहीं रहती।
कार्कल की सुगंधी बताती हैं कि होटल में खाना खाने पर रोजाना करीब 150 रुपए खर्च हो जाते। दोपहर में दूसरे ट्रस्ट से और शाम को कारुण्य से भोजन मिलने से यह पैसा बच जाता है। बचे पैसे से मरीज के लिए फल खरीदे जा सकते हैं।
2017 में शुरू हुआ सफर, संकट में भी नहीं रुका
एम. फ्रेंड्स चैरिटेबल ट्रस्ट की शुरुआत 2013 में समान विचारधारा वाले लोगों ने की थी। सामाजिक कार्यकर्ता राशिद विटला इसके संस्थापक हैं। शुरुआती दौर में अस्पताल का बिल नहीं चुका पाने वाले मरीजों की आर्थिक मदद, जरूरतमंदों को व्हीलचेयर उपलब्ध कराने जैसी गतिविधियां की जाती थीं।
ट्रस्ट के कार्याध्यक्ष सुजाह मोहम्मद बताते हैं कि वेनलॉक में मरीजों की देखभाल करने वाले परिजनों को कई बार भोजन के पैसे के अभाव में भूखे रहते देखा गया। इसी से कारुण्य भोजन वितरण योजना का विचार आया।
2017 में तीन महीने के लिए शुरू हुई यह पहल बाद में नियमित हो गई। कोरोना जैसे संकट के दौर में भी सेवा नहीं रुकी। अब करीब नौ वर्षों से यह सिलसिला जारी है।
सुजाह मोहम्मद के अनुसार, यहां जाति और धर्म का कोई भेद नहीं है। बीमारी और परेशानी के सामने हर व्यक्ति समान है। रोजाना वेनलॉक में औसतन 400 और सरकारी लेडी गोशेन अस्पताल में करीब 100 लोगों को भोजन कराया जाता है। इस पर लगभग 2.5 लाख रुपए प्रतिमाह खर्च होते हैं।
रोज डेढ़ से दो हजार रोटियां
एम. फ्रेंड्स टीम में 72 सदस्य हैं। सदस्यता शुल्क के अलावा आर्थिक रूप से सक्षम लोग भी इस सेवा में सहयोग करते हैं। हर दिन दोपहर में वार्डों में मरीजों के तीमारदारों को टोकन दिए जाते हैं। टोकन संख्या के आधार पर डेढ़ से दो हजार चपाती या इडली तैयार की जाती हैं। शाम 5.30 बजे वेनलॉक में वितरण शुरू होता है और करीब आधे घंटे में पूरी प्रक्रिया पूरी हो जाती है।
बच्चों के वार्ड में व्यवस्था अलग है। वहां कारुण्य के कार्यकर्ता वार्ड तक जाकर माताओं के हाथ में भोजन पहुंचाते हैं। पिछले साल नवंबर से लेडी गोशेन अस्पताल में भी यह सेवा शुरू की गई है।
जन्मदिन-मुबारक दिन अब भूख मिटाने के नाम
कारुण्य के लिए धन जुटाने का तरीका भी अपने आप में प्रेरक है। रमजान के दौरान एक सदस्य ने व्हाट्सऐप समूह में संदेश डाला कि ट्रस्ट के मानद अध्यक्ष और उद्योगपति जकरिया जॉकट्टे रमजान महीने और अपने बच्चों के जन्मदिन के अवसर पर एक-एक महीने के भोजन का खर्च उठाएंगे। इसके बाद सहयोग की मुहिम शुरू हुई और महज एक-दो घंटे में पूरे साल के भोजन के लिए करीब 30 लाख रुपए जुटाने की जिम्मेदारी तय हो गई।
अब कई लोग जन्मदिन और शादी की सालगिरह जैसे विशेष अवसरों को कारुण्य के साथ जोडक़र मनाते हैं। यानी उत्सव का एक हिस्सा किसी जरूरतमंद की थाली तक पहुंचता है।
भूख के साथ भविष्य की भी चिंता
एम. फ्रेंड्स का काम सिर्फ भोजन तक सीमित नहीं है। ट्रस्ट क्लास ऑन व्हील्स नामक मोबाइल कंप्यूटर बस के जरिए सरकारी स्कूलों और झुग्गी-बस्तियों के बच्चों को नि:शुल्क कंप्यूटर शिक्षा भी देता है।
एक तरफ अस्पताल के बाहर भूख से जूझते परिवारों के लिए भोजन, दूसरी तरफ वंचित बच्चों के हाथों में शिक्षा और तकनीक।
शाम ढलते-ढलते वेनलॉक अस्पताल के पीछे लगी कतार खत्म हो गई। खाली डिब्बे और प्लेटें थामे लोग फिर अपने-अपने वार्ड की ओर लौट गए। सडक़ फिर सामान्य हो गई। लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अगली शाम 5.30 बजे फिर वही वाहन आएगा, फिर कतार लगेगी और फिर सैकड़ों हाथ भोजन के लिए आगे बढ़ेंगे। क्योंकि किसी के लिए वे तीन चपातियां सिर्फ खाना नहीं—अगली सुबह तक टिके रहने की उम्मीद हैं।
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